अनमोल वचन - सत्संग के मोती (Pearls of wisdom) [सत्संग Quotes]



धन, वैभव, कुटुम्ब, विद्या, दान, रूप, बल और कर्म आदिके गर्वसे अन्धे होकर दुष्टलोग भगवन् और भगवान्‌के भक्त महात्माओंका तिरस्कार किया करते हैं।


हमारी निष्ठाके अनुकूल ही हमारी आध्यात्मिक उन्नतिमें सफलता होती है। इसलिये जिसे विशेष उन्नतिकी अपेक्षा हो वह विशेष परिश्रम करे।


इस दुनियामें लोगोंकी दोस्ती बाहरसे देखने में सुन्दर, पर भीतरसे जहरीली होती है।


प्रेम, दया और सेवा ऐसे शस्त्र हैं कि इनसे अधर्मके दुर्दान्त कामादि शत्रुओंके दल सहजमें ही परास्त हो जाते हैं।


भीतरसे प्रभुकी प्रगाढ़ भक्ति करना, किंतु बाहरसे उसे प्रकट न होने देना साधुताका मुख्य चिह्न है।


सब प्रकारसे अपने हितके कार्य करने चाहिये।


अपने निजके अधिकारके पीछे लगे रहनेकी अपेक्षा जो बुद्धिमान् और विवेकशील हैं, उनसे राय लो, अपनेसे जो बड़े हों उनसे शिक्षा लेनेकी कोशिश करो।


हरिके बिना यह सारा संसार झूठा व्यवहार है; व्यर्थका आना-जाना है।


भक्तका हृदय भगवान्‌की बैठक है।


जो मनुष्य अच्छी सलाह नहीं सुनता, उसको धिक्कार सुनना पड़ता है।


विषय-वासनाके वशमें होकर सांसारिक बन्धनोंमें फँसना मानवधर्म नहीं है। स्त्री, धन, पुत्र, पशु, घर, भूमि, हाथी, खजाना - ये सभी नाशवान्, क्षणभंगुर और चलायमान हैं। इनमें ममता रखना भूल हैं। एकमात्र भगवान्की भक्तिसे प्राप्त मोक्ष ही अक्षय और सर्वश्रेष्ठ है, अतएव सभी मनुष्योंको भगवद्भक्तिमें लग जाना चाहिये।


संतोंकी जीवनचर्या संसारके लिये आइनेके समान होती है।


जैसे पक्षी रातको आकर पेड़पर बसेरा करते हैं और दिन उगते ही उड़ जाते हैं, वैसी ही हालत कुटुम्बकी समझनी चाहिये।


मनुष्य-जीवन बहुत ही थोड़ा है। इसलिये मनुष्यको जबतक दम रहे सब कुछ तजकर एकमात्र परमात्माका भजन करना चाहिये।


संसार कच्चा कुआँ है। इसके किनारेपर खूब सावधानीसे खड़े होना चाहिये। तनिक असावधान होते ही कुएँ में गिर पड़ोगे, तब निकलना कठिन हो जायगा।


धर्मपालनमें बहानेबाजी कभी नहीं करनी चाहिये, मैंने सत्यही से सब शस्त्र प्राप्त किये हैं। मैं सत्यसे कभी नहीं डिग सकता।


इस नाशवान् संसारमें जो आसक्त नहीं है वही सच्चा ऋषि है। तल्लीन होकर ईश्वरके गुण गाना, मत्त होकर प्रभुके संगीत सुनना और प्रभुकी अधीनता मानकर काम करना ही ऋषिका धर्म है।


जब हम प्रलोभनोंमें पड़ें, हमें निराश नहीं होना चाहिये, परंतु उतनी ही अधिक तत्परतासे हमें भगवान्‌को पुकारना चाहिये कि वह हमें सारी कठिनाइयोंसे तुरंत निकाल लें।


चिन्तनके लिये कोई समय नहीं लगता, उसके लिये कुछ मूल्य नहीं देना पड़ता, सब समय ही ‘राम कृष्ण हरि गोविन्द’ नाम जिह्वापर बना रहे। यही एक सत्य-सार है व्युत्पत्तिका भार केवल व्यर्थ है।


दूसरोंसे लेनेकी अपेक्षा देनेमें जिसे अधिक सुख नहीं मालूम होता वह सच्चा संत नहीं हो सकता।


जिस घरमें साधुकी निन्दा होती है, वह समूल नष्ट हो जाता है, उसकी नींव, नाम और जगहका भी पता नहीं लगता।


धर्मका आचरण करो और विषय-वासनारूपी जो सांसारिक व्यवहार हैं उन्हें छोड़ दो। सत्पुरुषोंका निरन्तर संग करो और हृदयसे भोगोंकी इच्छाको निकालकर बाहर फेंक दो। दूसरोंके गुण दोषका चिन्तन करना एकदम त्याग दो। श्रीहरिकी सेवा-कथारूपी जो रसायन है, उसका निरन्तर पान करते रहो बस, मनुष्यमात्रका इतना ही कर्तव्य हैं।


हे प्रभो! आपके सिवा मेरा कोई नहीं। आप मेरे हैं तो फिर सब कुछ मेरा है। मुझे अपनेसे जरा भी अलग न करिये। मेरे सामने अपने सिवा और किसीको न आने दें।


सहज अनुकम्पासे प्राणियोंके साथ अन्न, वस्त्र, दान, मान इत्यादिसे प्रिय आचरण करना चाहिये। यही सबका स्वधर्म है।


परमात्मा सबके अन्दर हैं। फिर एक सुमार्गमें जाता है, दूसरा कुमार्गमें। इसका कारण ? कारण यही है कि सुमार्ग में जानेवाला अपना सब कुछ भगवान्‌को सौंप देता है और कुमार्गमें जानेवाला अपना सब कुछ इन्द्रियोंको सौंप देता है।


यह समझ लो कि चारों मुक्तियाँ हरिदासों की दासियाँ हैं।


इस संसारकी अपेक्षा भी कोई प्रियतम वस्तु इसकी अवश्य है; क्योंकि यह मन समय-समयपर इससे छूटकर उसकी ओर दौड़ना चाहता है।


संसारमें भटकते-भटकते मैं थक गया। ‘नाम ‘से काया शीतल हुई।


धनके साथ दो लुटेरे लगे रहते हैं, जो निरन्तर दैवी गुणोंको लूटते रहते हैं—एक अभिमान और दूसरा खुशामदी।


भगवन् ! तुमसे यदि मेरी प्रत्यक्ष भेंट नहीं हुई और कोरी बातें ही करते रहे तो ये संत मुझे क्या कहेंगे। इसको भी तनिक विचारो।


भगवान् ही सब साधनोंके साध्य हैं और सब चराचर प्राणियोंमें भगवान्को देखकर सर्वत्र अखण्ड-भगवद्बुद्धिको स्थिर रखना और सबके कल्याणका उद्योग करना अर्थात् लोकसंग्रह और लोकोपकारमें तन-मन-प्राण अर्पण करना ही सच्ची हरिभक्ति है।


संसारमें कालका कलेवा बनकर कौन सुखी हुआ है।


सभी प्राणियोंके अन्दर भगवान् श्रीहरि आत्मरूपसे विराजमान हैं; अतः सब प्राणियोंको भगवान्‌का निवासस्थान समझकर किसीसे भी द्रोह न कर; ऐसा करनेसे ही भगवान् प्रसन्न होते हैं।


जो शान्त, दान्त, उपरत, तितिक्षु और समाहित होता है, वही आत्माको देखता है और वही सबका आत्मरूप होता है।


जो लोभी विषयोंकी आशाओंके दास बने हुए हैं, वे तो सभीके गुलाम हैं । जिन्होंने भगवान्में विश्वास करके आशाको जीत लिया है, वे ही भगवान्‌के सच्चे सेवक हैं।


कीर्तनका अधिकार सबको है, इसमें वर्ण या आश्रमका भेद-भाव नहीं।


जो मनुष्य ईश्वरको छोड़कर दूसरेसे स्नेह करता है. वह क्या कभी सुखी हो सकता है।


अधम कौन है? जो ईश्वरके मार्गका अनुसरण नहीं करता।


यह संसार दुःखसे बँधा है, इसमें सुखका विचार तो कहीं भी नहीं है।


संतोंका मुख्य कार्य जीवोंको मोह-मायाकी निद्रासे जगा देना होता है स्वयं जगे रहते हैं, दूसरोंको जगा देते हैं, जीवोंको अभय दान देते हैं और उनका दैन्य नष्ट कर उन्हें स्वानन्द साम्राज्यपदपर आरूढ़ करते हैं।


प्रेमी भक्त प्रेमसे जहाँ हरिगुण-गान करते हैं, भगवान् तो वहाँ रहते ही हैं।


साधनोंमें मुख्य साधन श्रीहरिकी भक्ति ही है। भक्तिमें भी नामकीर्तन विशेष है-नामसे चित्त-शुद्धि होती है साधकोंको स्वरूप-स्थिति प्राप्त होती है।


भाव मत छोड़। संदेह छोड़ दे; गला फाड़कर राम कृष्णको पुकार।


क्रोध मनुष्यका बड़ा भारी बैरी है, लोभ अनन्त रोग है, सब प्राणियोंका हित करना साधुता है और निर्दयता ही असाधुपन है।


श्रीरामके बिना जो मुख है वह केवल चर्मकुण्ड है। भीतर जो जिह्वा है वह चमड़ेका टुकड़ा है।


प्रेम छिपानेसे नहीं छिपता । प्रेमको विज्ञापनकी आवश्यकता नहीं।


जप-तप, भजन-पूजन तथा लौकिक, पारलौकिक सभी प्रकारके कार्यों में विश्वास ही मुख्य है। विश्वासके सम्मुख कोई बात असम्भव नहीं।


यदि तुम आध्यात्मिकतामें उन्नति करना चाहते हो तो सदा भगवान्से डरते रहो। अधिक स्वतन्त्रताका दावा मत करो । संयमके कठोर नियमोंमें रहकर अपनी इन्द्रियोंका निग्रह करो और मूर्खतापूर्ण हास-परिहासमें समय नष्ट न करो।


एक क्षणमें पचासों जगह चक्कर लगा आनेवाले इस मनको भगवान् दया करें तो ही रोक सकते हैं।


एक बार अपने अंदर प्रेमकी आग जग जाने दो, फिर तुम्हारे जिस दोषके साथ उसका स्पर्श होगा वही दोष जल जायगा। तुम्हारा 'तू' पन जल जायगा, अहंकार नाश हो जायगा, 'मैं', 'मेरा' आदि भाव भस्म हो जायँगे और जब नया भाव सुलग उठेगा तब उसके तापमें प्रेमसे इतना महान् सुख मिलेगा कि उसके सामने विश्वका सारा सुख तुच्छ हो जायगा।


खबरदार ! एक पैसा भी कमाओ तो न्यायसे कमाना और कहीं कुछ खर्च करना तो अच्छे मार्गमें ही खर्च करना।


सच्चा शिष्य गुरुके किसी बाहरी कामपर लक्ष्य नहीं करता। वह तो केवल गुरुकी आज्ञाको ही सिर नवाकर पालन करता है।


प्रभु- प्रेम मनुष्यसे प्रभु-प्रेमकी बातें करवाता है । प्रभुकी लज्जा उसे असत् बोलनेमें मौन रखती है और प्रभुका भय उसे पाप करनेसे बचाता है।


चार प्रकारके मनुष्य होते हैं- (1) मक्खीचूस न आप खाय न दूसरोंको दे, (2) कंजूस- आप तो खाय, पर दूसरेको न दे, (3) उदार - आप भी खाय और दूसरेको भी दे और (4) दाता- आप न खाय और दूसरेको दे। यदि सब लोग दाता नहीं बन सकते तो उदार तो बनना ही चाहिये।


जिसके मुखसे एक बार भी श्रीकृष्णका नाम निकल जाय, वही वैष्णव है। वैष्णवकी यह एक मोटी पहचान है।


मायावी संसारसे सदा सचेत रहना। यह बड़े-बड़े पण्डितोंके मनको भी वशमें कर लेता है।


अच्छे गुणोंको सीखनेमें तुम्हारी यह धारणा होनी चाहिये कि तुम्हारा अभिप्राय अपने सुधारका है, न कि लोकमें बड़ाई पानेका।


केवल ईश्वर-ज्ञान ही ज्ञान है और सब अज्ञान है।


असुरोंके नीच वारोंके लिये अपनेको सुसज्जित रखो। वासनाओंपर लगाम चढ़ाओ, इस प्रकार तुम उत्कट आकांक्षाओंको सहज ही जीत सकोगे।


तुम चाहे किसी भी मार्गपर चलो, परन्तु भोगकी इच्छाका-विषय-सुखकी वांछाका त्याग किये बिना तुम्हें अखण्ड शान्ति, अखण्ड आनन्दस्वरूप मोक्षकी प्राप्ति होगी ही नहीं।