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Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 12

भगवद् गीता अध्याय 9 श्लोक 12

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः।।9.12।।

हिंदी अनुवाद - स्वामी रामसुख दास जी ( भगवद् गीता 9.12)

।।9.12।।जिनकी सब आशाएँ व्यर्थ होती हैं? सब शुभकर्म व्यर्थ होते हैं और सब ज्ञान व्यर्थ होते हैं अर्थात् जिनकी आशाएँ? कर्म और ज्ञान सत्फल देनेवाले नहीं होते? ऐसे अविवेकी मनुष्य आसुरी? राक्षसी और मोहिनी प्रकृतिका आश्रय लेते हैं।

हिंदी टीका - स्वामी रामसुख दास जी

।।9.12।। व्याख्या --  मोघाशाः -- जो लोग भगवान्से विमुख होते हैं? वे सांसारिक भोग चाहते हैं? स्वर्ग चाहते हैं तो उनकी ये सब कामनाएँ व्यर्थ ही होती हैं। कारण कि नाशवान् और परिवर्तनशील वस्तुकी कामना पूरी होगी ही -- यह कोई नियम नहीं है। अगर कभी पूरी हो भी जाय? तो वह टिकेगी नहीं अर्थात् फल देकर नष्ट हो जायगी। जबतक परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती? तबतक कितनी ही सांसारिक वस्तुओंकी इच्छाएँ की जायँ और उनका फल भी मिल जाय तो भी वह सब व्यर्थ ही है (गीता 7। 23)।मोघकर्माणः -- भगवान्से विमुख हुए मनुष्य शास्त्रविहित कितने ही शुभकर्म करें? पर अन्तमें वे सभी व्यर्थ हो जायँगे। कारण कि मनुष्य अगर सकामभावसे शास्त्रविहित यज्ञ? दान आदि कर्म भी करेंगे? तो भी उन कर्मोंका आदि और अन्त होगा और उनके फलका भी आदि और अन्त होगा। वे उन कर्मोंके फलस्वरूप ऊँचेऊँचे लोकोंमें भी चले जायँगे? तो भी वहाँसे उनको फिर जन्ममरणमें आना ही पड़ेगा। इसलिये उन्होंने कर्म करके केवल अपना समय बरबाद किया? अपनी बुद्धि बरबाद की और मिला कुछ नहीं। अन्तमें रीतेकेरीते रह गये अर्थात् जिसके लिये मनुष्यशरीर मिला था? उस लाभसे सदा ही रीते रह गये। इसलिये उनके सब कर्म व्यर्थ? निष्फल ही हैं।तात्पर्य यह हुआ कि ये मनुष्य स्वरूपसे साक्षात् परमात्माके अंश हैं? सदा रहनेवाले हैं और कर्म तथा उनका,फल आदिअन्तवाला है अतः जबतक परमात्माकी प्राप्ति नहीं होगी? तबतक वे सकामभावपूर्वक कितने ही कर्म करें और उनका फल भोंगे? पर अन्तमें दुःख और अशान्तिके सिवाय कुछ नहीं मिलेगा।जो शास्त्रविहित कर्म अनुकूल परिस्थिति प्राप्त करनेकी इच्छासे सकामभावपूर्वक किये जाते हैं? वे ही कर्म व्यर्थ होते हैं अर्थात् सत्फल देनेवाले नहीं होते। परन्तु जो कर्म भगवान्के लिये? भगवान्की प्रसन्नताके लिये किये जाते हैं और जो कर्म भगवान्के अर्पण किये जाते हैं? वे कर्म निष्फल नहीं होते अर्थात् नाशवान् फल देनेवाले नहीं होते? प्रत्युत सत्फल देनेवाले हो जाते हैं -- कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते (गीता 17। 27)।सत्रहवें अध्यायके अट्ठाईसवें श्लोकमें भी भगवान्ने कहा है कि जिनकी मेरेमें श्रद्धा नहीं है अर्थात् जो मेरेसे विमुख हैं? उनके द्वारा किये गये यज्ञ? दान? तप आदि सभी कर्म असत् होते हैं अर्थात् मेरी प्राप्ति करानेवाले नहीं होते। उन कर्मोंका इस जन्ममें और मरनेके बाद भी (परलोकमें) स्थायी फल नहीं मिलता अर्थात् जो कुछ फल मिलता है? विनाशी ही मिलता है। इसलिये उनके वे सब कर्म व्यर्थ ही हैं।मोघज्ञाना -- उनके सब ज्ञान व्यर्थ हैं। भगवान्से विमुख होकर उन्होंने संसारकी सब भाषाएं सीख लीं? सब लिपियाँ सीख लीं? तरहतरहकी कलाएँ सीख लीं? तरहतरहकी विद्याओंका ज्ञान प्राप्त कर लिया? कई तरहके आविष्कार कर लिये? अनन्त प्रकारके ज्ञान प्राप्त कर लिये? पर इससे उनका कल्याण नहीं होगा? जन्ममरण नहीं छूटेगा। इसलिये वे सब ज्ञान निष्फल हैं। जैसे? हिसाब करते समय एक अंककी भी भूल हो जाय तो हिसाब कभी सही नहीं आता? सब गलत हो जाता है? ऐसे ही जो भगवान्से विमुख हो गये हैं? वे कुछ भी ज्ञानसम्पादन करें? वह सब गलत होगा और पतनकी तरफ ही ले जायगा।विचेतसः -- उनको सारअसार? नित्यअनित्य? लाभहानि? कर्तव्यअकर्तव्य? मुक्तिबन्धन आदि बातोंका ज्ञान नहीं है।राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः -- ऐसे वे अविवेकी और भगवान्से विमुख मनुष्य आसुरी? राक्षसी और मोहिनी प्रकृति अर्थात् स्वभावका आश्रय लेते हैं।जो मनुष्य अपना स्वार्थ सिद्ध करनेमें? अपनी कामनापूर्ति करनेमें? अपने प्राणोंका पोषण करनेमें ही लगे रहते हैं? दूसरोंको कितना दुःख हो रहा है? दूसरोंका कितना नुकसान हो रहा है -- इसकी परवाह ही नहीं करते? वे आसुरी स्वभाववाले होते हैं।जिनके स्वार्थमें? कामनापूर्तिमें बाधा लग जाती है? उनको गुस्सा आ जाता है और गुस्सेमें आकर वे अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके लिये दूसरोंका नुकसान कर देते हैं? दूसरोंका नाश कर देते हैं? वे राक्षसी स्वभाववाले होते हैं।जिसमें अपना न स्वार्थ है? न परमार्थ है और न वैर है? फिर भी बिना किसी कारणके जो दूसरोंका नुकसान कर देते हैं? दूसरोंको कष्ट देते हैं (जैसे? उड़ते हुए पक्षीको गोली मार दी? सोते हुए कुत्तेको लाठी मार दी और फिर राजी हो गये)? वे मोहिनी स्वभाववाले होते हैं।परमात्मासे विमुख होकर केवल अपने प्राणोंको रखनेकी अर्थात् सुखपूर्वक जीनेकी जो इच्छा होती है? वह आसुरी प्रकृति है। ऊपर जो तीन प्रकारकी प्रकृति (आसुरी? राक्षसी और मोहिनी) बतायी गयी है? उसके मूलमें आसुरी प्रकृति ही है अर्थात् आसुरी सम्पत्ति ही सबका मूल है। एक आसुरी सम्पत्तिके आश्रित होनेपर राक्षसी और मोहिनी प्रकृति भी स्वाभाविक आ जाती है। कारण कि उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंका ध्येय होनेसे सब अनर्थपरम्परा आ ही जाती है। उसी आसुरी सम्पत्तिके तीन भेद यहाँ बताये गये हैं -- कामनाकी प्रधानतावालोंकी आसुरी? क्रोधकी प्रधानतावालोंकी राक्षसी और मोह(मूढ़ता) की प्रधानतावालोंकी मोहिनी प्रकृति होती है। तात्पर्य है कि कामनाकी प्रधानता होनेसे आसुरी प्रकृति आती है। जहाँ कामनाकी प्रधानता होती है? वहाँ राक्षसी प्रकृति -- क्रोध आ ही जाता है -- कामात्क्रोधोऽभिजायते (गीता 2। 62) और जहाँ क्रोध आता है? वहाँ मोहिनी प्रकृति (मोह) आ ही जाता है -- क्रोधाद्भवति सम्मोहः (2। 63)। यह सम्मोह लोभसे भी होता है और मूर्खतासे भी होता है। सम्बन्ध --  चौथे श्लोकसे लेकर दसवें श्लोकतक भगवान्ने अपने प्रभाव? सामर्थ्य आदिका वर्णन किया। उस प्रभावको न माननेवालोंका वर्णन तो ग्यारहवें और बारहवें श्लोकमें कर दिया। अब उस प्रभावको जानकर भजन करनेवालोंका वर्णन आगके श्लोकमें करते हैं।