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Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 19

भगवद् गीता अध्याय 8 श्लोक 19

भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे।।8.19।।

हिंदी अनुवाद - स्वामी रामसुख दास जी ( भगवद् गीता 8.19)

।।8.19।।हे पार्थ वही यह प्राणिसमुदाय उत्पन्न होहोकर प्रकृतिके परवश हुआ ब्रह्माके दिनके समय उत्पन्न होता है और ब्रह्माकी रात्रिके समय लीन होता है।

हिंदी टीका - स्वामी रामसुख दास जी

।।8.19।। व्याख्या --   भूतग्रामः स एवायम् -- अनादिकालसे जन्ममरणके चक्करमें पड़ा हुआ यह प्राणिसमुदाय वही है जो कि साक्षात् मेरा अंश मेरा स्वरूप है। मेरा सनातन अंश होनेसे यह नित्य है। सर्ग और प्रलय तथा महासर्ग और महाप्रलयमें भी यही था और आगे भी यही रहेगा। इसका न कभी अभाव हुआ है और न आगे कभी इसका अभाव होगा। तात्पर्य है कि यह अविनाशी है इसका कभी विनाश नहीं होता। परन्तु भूलसे यह प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है। प्राकृत पदार्थ (शरीर आदि) तो बदलते रहते हैं उत्पन्न और नष्ट होते रहते हैं पर यह उनके सम्बन्धको पकड़े रहता है। यह कितने आश्चर्यकी बात है कि सम्बन्धी (सांसारिक पदार्थ) तो नहीं रहते पर उनका सम्बन्ध रहता है क्योंकि उस सम्बन्धको स्वयंने पकड़ा है। अतः यह स्वयं जबतक उस सम्बन्धको नहीं छोड़ता तबतक उसको दूसरा कोई छुड़ा नहीं सकता। उस सम्बन्धको छोड़नेमें यह स्वतन्त्र है सबल है। वास्तवमें यह उस सम्बन्धको रखनेमें सदा परतन्त्र है क्योंकि वे पदार्थ तो हरदम बदलते रहते हैं पर यह नयानया सम्बन्ध पकड़ता रहता है। जैसे बालकपनको इसने नहीं छोड़ा और न छोड़ना चाहा पर वह छूट गया। ऐसे ही जवानीको इसने नहीं छोड़ा पर वह छूट गयी। और तो क्या यह शरीरको भी छोड़ना नहीं चाहता पर वह भी छूट जाता है। तात्पर्य यह हुआ कि प्राकृत पदार्थ तो छूटते ही रहते हैं पर यह जीव उन पदार्थोंके साथ अपने सम्बन्धको बनाये रखता है जिससे,इसको बारबार शरीर धारण करने पड़ते हैं बारबार जन्मनामरना पड़ता है। जबतक यह उस माने हुए सम्बन्धको नहीं छोड़ेगा तबतक यह जन्ममरणकी परम्परा चलती ही रहेगी कभी मिटेगी नहीं।भगवान्के द्वारा अकेले खेल नहीं हुआ (एकाकी न रमते) तो खेल खेलनेके लिये अर्थात् प्रेमका आदानप्रदान करनेके लिये भगवान्ने इस प्राणिसमुदायको शरीररूप खिलौनेके सहित प्रकट किया। खेलका यह नियम होता है कि खेलके पदार्थ केवल खेलनेके लिये ही होते हैं किसीके व्यक्तिगत नहीं होते। परन्तु यह प्राणिसमुदाय खेल खेलना तो भूल गया और खेलके पदार्थोंको अर्थात् शरीरोंको व्यक्तिगत मानने लग गया। इसीसे यह उनसे फँस गया और भगवान्से सर्वथा विमुख हो गया।भूत्वा भूत्वा प्रलीयते -- ये पद शरीरोंके लिये कहे गये हैं जो कि उत्पन्न और नष्ट होते रहते हैं अर्थात् जिनमें प्रतिक्षण ही परिवर्तन होता रहता है। परन्तु जीव उन शरीरोंके परिवर्तनको अपना परिवर्तन और उनके जन्मनेमरनेको अपना जन्ममरण मानता रहता है। इसी मान्यताके कारण उसका जन्ममरण कहा जाता है।यह स्वयं सत्स्वरूप है -- भूतग्रामः स एवायम् और शरीर उत्पत्तिविनाशशील हैं -- भूत्वा भूत्वा प्रलीयते इसलिये शरीरोंको धारण करना अर्थात् जन्ममरणका होना परधर्म है और मुक्त होना स्वधर्म है।रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे -- यहाँ अवशः कहनेका तात्पर्य है कि अगर यह जीव प्रकृतिकी वस्तुओंमेंसे किसी भी वस्तुको अपनी मानता रहेगा तो उसको वहम तो यह होगा कि मैं इस वस्तुका मालिक हूँ पर हो जायगा उस वस्तुके परवश पराधीन। प्राकृत पदार्थोंको यह जितना ही अधिक ग्रहण करेगा उतना ही यह महान् परतन्त्र बनता चला जायगा। फिर इसकी परतन्त्रता कभी छूटेगी ही नहीं। ब्रह्माजीके जगने और सोनेपर अर्थात् सर्ग और प्रलयके होनेपर ( 8। 18) ब्रह्माजीके प्रकट और लीन होनेपर अर्थात् महासर्ग और महाप्रलयके होनेपर (9। 7 8) तथा वर्तमानमें प्रकृतिके परवश होकर कर्म करते रहनेपर (3। 5) भी यह जीव जन्मना और मरना तथा कर्म करना और उसका फल भोगना -- इस आफतसे कभी छूटेगा ही नहीं। इससे सिद्ध हुआ कि जबतक परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती बोध नहीं होता और यह प्रकृतिके सम्बन्धको नहीं छोड़ता तबतक परतन्त्र होनेके कारण यह दुःखरूप जन्ममरणके चक्करसे छूट नहीं सकता। परन्तु जब इसकी प्रकृति और प्रकृतिजन्य पदार्थोंकी परवशता मिट जाती है अर्थात् इसको प्रकृतिके सम्बन्धसे सर्वथा रहित अपने शुद्ध स्वरूपका बोध हो जाता है तो फिर यह महासर्गमें भी उत्पन्न नहीं होता और महाप्रलयमें भी व्यथित नहीं होता -- सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च (गीता 14। 2)।मूलमें परवशता प्रकृतिजन्य पदार्थोंको महत्त्व देने उनको स्वीकार करनेमें ही है। इस परवशताको ही कहीं कालकी कहीं स्वभावकी कहीं कर्मकी और कहीं गुणोंकी परवशताके नामसे कहा गया है।इस प्राणिसमुदायकी यह परवशता तभीतक रहती है जबतक यह प्राकृत पदार्थोंके संयोगसे सुख लेना चाहता है। इस संयोगजन्य सुखकी इच्छासे ही यह पराधीनता भोगता रहता है और ऐसा मानता रहता है कि यह पराधीनता छूटती नहीं इसको छो़ड़ना बड़ा कठिन है। परन्तु यह परवशता इसकी ही बनायी हुई है स्वतः नहीं है। अतः इसको छोड़नेकी जिम्मेवारी इसीपर है। इसको यह जब चाहे तभी छोड़ सकता है। सम्बन्ध --   अनित्य संसारका वर्णन करके अब आगेके श्लोकमें जीवोंके प्रापणीय परमात्माकी महिमाका विशेष वर्णन करते हैं।