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Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 8

भगवद् गीता अध्याय 15 श्लोक 8

शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्।।15.8।।

हिंदी अनुवाद - स्वामी रामसुख दास जी ( भगवद् गीता 15.8)

।।15.8।।जैसे वायु गन्धके स्थानसे गन्धको ग्रहण करके ले जाती है? ऐसे ही शरीरादिका स्वामी बना हुआ जीवात्मा भी जिस शरीरको छोड़ता है? वहाँसे मनसहित इन्द्रियोंको ग्रहण करके फिर जिस शरीरको प्राप्त होता है? उसमें चला जाता है।

हिंदी अनुवाद - स्वामी तेजोमयानंद

।।15.8।। जब (देहादि का) ईश्वर (जीव) (एक शरीर से) उत्क्रमण करता है? तब इन (इन्द्रियों और मन) को ग्रहण कर अन्य शरीर में इस प्रकार ले जाता है? जैसे गन्ध के आश्रय (फूलादि) से गन्ध को वायु ले जाता है।।

हिंदी टीका - स्वामी रामसुख दास जी

।।15.8।। व्याख्या --   वायुर्गन्धानिवाशयात् -- जिस प्रकार वायु इत्रके फोहेसे गन्ध ले जाती है किन्तु वह गन्ध स्थायीरूपसे वायुमें नहीं रहती क्योंकि वायु और गन्धका सम्बन्ध नित्य नहीं है? इसी प्रकार इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि? स्वभाव आदि(सूक्ष्म और कारण -- दोनों शरीरों) को अपना माननेके कारण जीवात्मा उनको साथ लेकर दूसरी योनिमें जाता है।जैसे वायु तत्त्वतः गन्धसे निर्लिप्त है? ऐसे ही जीवात्मा भी तत्त्वतः मन? इन्द्रियाँ? शरीरादिसे निर्लिप्त है परन्तु इन मन? इन्द्रियाँ? शरीरादिमें मैंमेरेपनकी मान्यता होनेके कारण वह (जीवात्मा) इनका आकर्षण करता है।जैसे वायु आकाशका कार्य होते हुए भी पृथ्वीके अंश गन्धको साथ लिये घूमती है? ऐसे ही जीवात्मा परमात्माका सनातन अंश होते हुए भी प्रकृतिके कार्य (प्रतिक्षण बदलनेवाले) शरीरोंको साथ लिये भिन्नभिन्न योनियोंमें घूमता है। जड होनेके कारण वायुमें यह विवेक नहीं है कि वह गन्धको ग्रहण न करे परन्तु जीवात्माको तो यह विवेक और सामर्थ्य मिला हुआ है कि वह जब चाहे? तब शरीरसे सम्बन्ध मिटा सकता है। भगवान्ने मनुष्यमात्रको यह स्वतन्त्रता दे रखी है कि वह चाहे जिससे सम्बन्ध जोड़ सकता है और चाहे जिससे सम्बन्ध तोड़ सकता है। अपनी भूल मिटानेके लिये केवल अपनी मान्यता बदलनेकी आवश्यकता है कि प्रकृतिके अंश इन स्थूल? सूक्ष्म और कारणशरीरोंसे मेरा (जीवात्मका) कोई सम्बन्ध नहीं है। फिर जन्ममरणके बन्धनसे सहज ही मुक्ति है।भगवान्ने यहाँ तीन शब्द दृष्टान्तके रूपमें दिये हैं -- (1) वायु? (2) गन्ध और (3) आशय। आशय कहते हैं स्थानको जैसे -- जलाशय (जलआशय) अर्थात् जलका स्थान। यहाँ आशय नाम स्थूलशरीरका है। जिस प्रकार गन्धके स्थान (आशय) इत्रके फोहेसे वायु गन्ध ले जाती है और फोहा पीछे पड़ा रहता है? इसी प्रकार वायुरूप जीवात्मा गन्धरूप सूक्ष्म और कारणशरीरोंको साथ लेकर जाता है? तब गन्धका आशयरूप स्थूलशरीर पीछे रह जाता है।शरीरं यदवाप्नोति ৷৷. गृहीत्वैतानि संयाति -- यहाँ ईश्वरः पद जीवात्माका वाचक है। इस जीवात्मासे तीन खास भूलें हो रही हैं --,(1) अपनेको मन? बुद्धि? शरीरादि जड पदार्थोंका स्वामी मानता है? पर वास्तवमें बन जाता है स्वयं उनका दास।(2) अपनेको उन जड पदार्थोंका स्वामी मान लेनेके कारण अपने वास्तविक स्वामी परमात्माको भूल जाता है।(3) जड पदार्थोंसे माने हुए सम्बन्धका त्याग करनेमें स्वाधीन होनेपर भी उनका त्याग नहीं करता।परमात्माने जीवात्माको शरीरादि सामग्रीका सदुपयोग करनेकी स्वाधीनता दी है। उनका सदुपयोग करके अपना उद्धार करनेके लिये ये वस्तुएँ दी हैं? उनका स्वामी बननेके लिये नहीं। परन्तु जीवसे यह बहुत बड़ी भूल होती है कि वह उस सामग्रीका सदुपयोग नहीं करता प्रत्युत अपनेको उनका मालिक मान लेता है? पर वास्तवमें उनका गुलाम बन जाता है।जीवात्मा जड पदार्थोंसे माने हुए सम्बन्धका त्याग तभी कर सकता है? जब उसे यह मालूम हो जाय कि इनका मालिक बननेसे मैं सर्वथा पराधीन हो गया हूँ और मेरा पतन हो गया है। यह जिनका मालिक बनता है? उनकी गुलामी इसमें आ ही जाती है। इसे केवल वहम होता है कि मैं इनका मालिक हूँ। जड पदार्थोंका मालिक बन जानेसे एक तो इसे उन पदार्थोंकी कमी का अनुभव होता है और दूसरा यह अपनेको अनाथ मान लेता है।जिसे मालिकपना या अधिकार प्यारा लगता है? वह परमात्माको प्राप्त नहीं कर सकता क्योंकि जो किसी व्यक्ति? वस्तु? पद आदिका स्वामी बनता है? वह अपने स्वामीको भूल जाता है -- यह नियम है। उदाहरणार्थ? जिस समय बालक केवल माँको अपना मानकर उसे ही चाहता है? उस समय वह माँके बिना रह ही नहीं सकता। किन्तु वही बालक जब बड़ा होकर गृहस्थ बन जाता है और अपनेको स्त्री? पुत्र आदिका स्वामी मानने लगता है? तब उसी माँका पास रहना उसे सुहाता नहीं। यह स्वामी बननेका ही परिणाम है इसी प्रकार यह जीवात्मा भी शरारीदि जड पदार्थोंका स्वामी (ईश्वर) बनकर अपने वास्तविक स्वामी परमात्माको भूल जाता है -- उनसे विमुख हो जाता है। जबतक यह भूल या विमुखता रहेगी? तबतक जीवात्मा दुःख पाता ही रहेगा।ईश्वरः पदके साथ अपि पद एक विशेष अर्थ रखता है कि यह ईश्वर बना जीवात्मा वायुके समान असमर्थ? जड और पराधीन नहीं है। इस जीवात्मामें ऐसी सामर्थ्य और विवेक है कि यह जब चाहे? तब माने हुए सम्बन्धको छोड़ सकता है और परमात्माके साथ नित्य सम्बन्धका अनुभव कर सकता है। परन्तु संयोगजन्य सुखकी लोलुपताके कारण यह संसारसे माने हुए सम्बन्धको छोड़ता नहीं और छोड़ना चाहता भी नहीं। जडता(शरीरादि) से तादात्म्य छूटनेपर जीवात्मा (गन्धकी तरह) शरीरोंको साथ ले जा सकता ही नहीं।जीवको दो शक्तियाँ प्राप्त हैं -- (1) प्राणशक्ति? जिससे श्वासोंका आवागमन होता है और (2) इच्छाशक्ति? जिससे भोगोंको पानेकी इच्छा करता है। प्राणशक्ति हरदम (श्वासोच्छ्वासके द्वारा) क्षीण होती रहती है। प्राणशक्तिका खत्म होना ही मृत्यु कहलाती है। जडका संग करनेसे कुछ करने और पानेकी इच्छा बनी रहती है। प्राणशक्तिके रहते हुए इच्छाशक्ति अर्थात् कुछ करने और पानेकी इच्छा मिट जाय? तो मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है। प्राणशक्ति नष्ट हो जाय और इच्छाएँ बनी रहें? तो दूसरा जन्म लेना ही पड़ता है। नया शरीर मिलनेपर इच्छाशक्ति तो वही (पूर्वजन्मकी) रहती है? प्राणशक्ति नयी मिल जाती है।प्राणशक्तिका व्यय इच्छाओंको मिटानेमें होना चाहिये। निःस्वार्थभावसे सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत रहनेसे इच्छाएँ सुगमतापूर्वक मिट जाती हैं।यहाँ गृहीत्वा पदका तात्पर्य है -- जो अपने नहीं हैं? उनसे राग? ममता? प्रियता करना। जिन मन? इन्द्रियोंके साथ अपनापन करके जीवात्मा उनको साथ लिये फिरता है? वे मन? इन्द्रियाँ कभी नहीं कहतीं कि हम तुम्हारी हैं और तुम हमारे हो। इनपर जीवात्माका शासन भी चलता नहीं जैसा चाहे वैसा रख सकता नहीं? परिवर्तन कर सकता नहीं फिर भी इनके साथ अपनापन रखता है? जो कि भूल ही है। वास्तवमें यह अपनेपनका (राग? ममतायुक्त) सम्बन्ध ही बाँधनेवाला होता है।वस्तु हमें प्राप्त हो या न हो? बढ़िया हो या घटिया हो? हमारे काममें आये या न आये? दूर हो या पास हो,यदि उस वस्तुको हम अपनी मानते हैं तो उससे हमारा सम्बन्ध बना हुआ ही है।अपनी तरफसे छोड़े बिना शरीरादिमें ममताका सम्बन्ध मरनेपर भी नहीं छूटता। इसलिये मृत शरीरकी हड्डियोंको गङ्गाजीमें डालनेसे उस जीवकी आगे गति होती है। इस माने हुए सम्बन्धको छोड़नेमें हम सर्वथा स्वतन्त्र तथा सबल हैं। यदि शरीरके रहते हुए ही हम उससे अपनापन हटा दें? तो जीतेजी ही मुक्त हो जायँजो अपना नहीं है? उसको अपना मानना और जो अपना है? उसको अपना न मानना -- यह बहुत ब़ड़ा दोष है? जिसके कारण ही पारमार्थिक मार्गमें उन्नति नहीं होती।इस श्लोकमें आया एतानि पद सातवें श्लोकके मनःषष्ठानीन्द्रियाणि (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा मन) का वाचक है। यहाँ एतानि पदको सत्रह तत्त्वोंके समुदायरूप सूक्ष्मशरीर एवं कारणशरीर(स्वभाव) का भी द्योतक मानना चाहिये। इस सबको ग्रहण करके जीवात्मा दूसरे शरीरमें जाता है। जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रोंका त्याग करके नये वस्त्र धारण करता है? ऐसे ही जीवात्मा पुराने शरीरका त्याग करके नये शरीरको प्राप्त होता है (गीता 2। 22)।वास्तवमें शुद्ध चेतन(आत्मा)का किसी शरीरको प्राप्त करना और उसका त्याग करके दूसरे शरीरमें जाना हो नहीं सकता क्योंकि आत्मा अचल और समानरूपसे सर्वत्र व्याप्त है (गीता 2। 17? 24)। शरीरोंका ग्रहण और त्याग परिच्छिन्न (एकदेशीय) तत्त्वके द्वारा ही होना सम्भव है? जबकि आत्मा कभी किसी भी देशकालादिमें परिच्छिन्न नहीं हो सकता। परन्तु जब यह आत्मा प्रकृतिके कार्य शरीरसे तादात्म्य कर लेता है अर्थात् प्रकृतिस्थ हो जाता है? तब (स्थूल? सूक्ष्म और कारण -- तीनों शरीरोंमें अपनेको तथा अपनेमें तीनों शरीरोंको धारण करने अर्थात् उनमें अपनापन करनेसे) वह प्रकृतिके कार्य शरीरोंका ग्रहणत्याग करने लगता है। तात्पर्य यह है कि शरीरको मैं और मेरा मान लेने कारण आत्मा सूक्ष्मशरीरके आनेजानेको अपना आनाजाना मान लेता है। जब प्रकृतिके कार्य शरीरसे तादात्म्य मिट जाता है अर्थात् स्थूल? सूक्ष्म और कारणशरीरसे आत्माका माना हुआ सम्बन्ध नहीं रहता तब ये शरीर अपने कारणभूत समष्टि तत्त्वोंमें लीन हो जाते हैं। तात्पर्य यह है कि पुनर्जन्मका मूल कारण जीवका शरीरसे माना हुआ तादात्म्य ही है। सम्बन्ध --   अब भगवान् सातवें श्लोकमें आये हुए मनःषष्ठानीन्द्रियाणि पदका खुलासा करते हैं।

हिंदी टीका - स्वामी चिन्मयानंद जी

।।15.8।। देहेन्द्रियादि का ईश्वर अर्थात् स्वामी है जीव। जब तक वह किसी एक देह मे रहता है? तब तक सूक्ष्म शरीर (इन्द्रियाँ और अन्तकरण) को धारण किये रहता है और असंख्य प्रकार के कर्म करता है। अपनी वासनाओं के अनुसार वह कर्म करता है और फिर कर्मो के नियमानुसार विविध फलों को भोगने के लिये उसे अन्यान्य शरीर ग्रहण करने पड़ते हैं। तब एक शरीर का त्याग करते समय वह सूक्ष्म शरीर को समेट लेता है और अन्य शरीर में जा कर पुन उसके द्वारा पूर्ववत् व्यवहार करता है।सूक्ष्म शरीर का स्थूल शरीर से सदा के लिये वियोग स्थूल शरीर के लिये मृत्यु है। मृत देह का आकार पूर्ववत् दिखाई देता है?किन्तु विषय ग्रहण? अनुभव तथा विचार ग्रहण करने की क्षमता उसमे नहीं होती? क्योंकि ये समस्त कार्य सूक्ष्म शरीर के होते हैं। जीव की उपस्थिति से ही देह को एक व्यक्ति के रूप में स्थान प्राप्त होता है।जिस प्रकार प्रवाहित किया हुआ वायु पुष्प? चन्दन? इत्र आदि सुगन्धित वस्तुओं की सुगन्ध को एक स्थान से अन्य स्थान बहा कर ले जाता है? उसी प्रकार जीव समस्त इन्द्रियादि को लेकर जाता है। वायु और सुगन्ध दृष्टिगोचर नहीं होते? उसी प्रकार देह को त्यागते हुये सूक्ष्म जीव को भी नेत्रों से नहीं देखा जा सकता है। जीव की समस्त वासनाएं भी उसी के साथ रहती हैं।इस श्लोक में जीव को देहादि संघात का ईश्वर कहने का अभिप्राय केवल इतना ही है कि उसी की उपस्थिति में विषय ग्रहण? विचार आदि का व्यवहार सुचारु रूप से चलता रहता है। वह इन उपाधियों का शासक और नियामक है। जिस प्रकार? किसी शासकीय अधिकारी का स्थानान्तर होने पर वह अपने घर की समस्त वस्तुओं को सन्दूकों में रखकर अपने नये स्थान पर पहुँचता है। तत्पश्चात्? वहाँ पुन अपने सामान को खोलकर नये गृह को सजाता है। ठीक इसी प्रकार जीवात्मा भी एक स्थूल शरीर को त्यागते समय समस्त इन्द्रियादि को एकत्रित कर शरीर को त्याग देता है? और फिर नवीन शरीर को धारण कर पुन सूक्ष्म शरीर के द्वारा समस्त व्यवहार करने लगता है। वेदान्त मे शरीर को भोगायतन कहते हैं। उपर्युक्त श्लोक वस्तुत उपनिषदों के ही सिद्धान्तों का ही सारांश है।वे इन्द्रियाँ कौन सी हैं सुनो

English Translation - Swami Gambirananda

15.8 When the master leaves it and even when he assumes a body, he departs taking these, as wind (carries away) odours from their receptacles.

English Translation - Swami Sivananda

15.8 When the Lord (as the individual soul) obtains a body and when He leaves it, He takes these and goes (with them) as the wind takes the scents from their seats (flowers, etc.).

English Translation - Dr. S. Sankaranarayan

15.8. Whatsoever body he attains to and also from whatsoever He goes up, the Lord proceeds taking them with Him just as the wind takes odours from their receptacle.

English Commentary - Swami Sivananda

15.8 शरीरम् a body? यत् when? अवाप्नोति obtains? यत् when? च and? अपि also? उत्क्रामति leaves? ईश्वरः the Lord? गृहीत्वा taking? एतानि these? संयाति goes? वायुः the wind? गन्धान् the scents? इव as? आशयात् from (their) seats (the flowers).Commentary Here is a description of how the subtle body leaves the gross body.When the Jiva? the Lord of the aggregate of the body and the rest takes up this body he brings in with him the mind and the senses when he leavs the body at its dissolution he takes with him the senses and the mind? just as the wind carries with it the fragrance from the flowers. Wherever he goes and whatever form he assumes he again operates through these senses and the mind.Lord Jiva? the Lord of the aggregate of the body and the rest.The Self appears to be an agent or an enjoyer only when he possesses or assumes a body.

English Translation of Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya's

15.8 Yat, when; isvarah, the master of the aggregate of the body etc., the individual soul; utkramati, leaves the body, then he draws. Thus, the second arter of the verse is treated first for the sake of consistency. [When the soul leaves the body, then it draws the organs (see previous verses) from that body. In this way, the second arter of the present verse is treated first, because going to another body follows the leaving of the earlier one.-M.S.] Ca api, and even; yat, when; it avapnoti, assumes a body other than the earlier one; then, grahitva, taking; etani, these, the organs with the mind as their sixth; samyati, he leaves, goes away totally [Samyak, totally-without returning in any way to the earlier body.-M.S.] Like what? In reply the Lord says: iva, as; vayuh, the wind (carries away); gandhan, odours; asayat, from their receptacles-flowers etc. Which, again, are those (organs)?

English Translation of Commentary - Dr. S. Sankaranarayan

15.8 Sariram etc. Attains to : seizes. Goes up : abandones along with them. Just as the wind, going everywhere reaches an abode of rest made of earth and carrying away thence an odour enters just with that into another place, in the same way does the individual Soul together with the octad of cities. So far the association of the individual Soul with them ( the sense organs etc.) at both the stages of creation and of withdrawal has been described. Now it is being decided that It acts only in association with them even at the stage of existence which consists of acts like standing, sitting, contemplating etc. and which is a stage of receiving objects-

English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary

15.8 Whatever body It acires, and from whatever body It departs, the lord of the senses, i.e., the self, goes on Its way taking with It the senses with the subtle elements, just like the wind carrying scents from place to place. Just as the wind takes away scents with subtle parts from flower-garlands, sandal, musk and the rest from their places and moves elsewhere - so does the self. What are these senses? Sri Krsna explains:

Commentary - Chakravarthi Ji

In dragging around the senses, what does the jiva do? When the jiva, the master of his senses (isvarah), accepts a body and leaves the body, he goes away, taking these senses along with the subtle body. This is like the wind taking the fragrances with its subtle elements from the re ceptacles of fragrance (asayat), such as garlands or sandalwood, and going elsewhere.

Rudra Vaishnava Sampradaya - Commentary

Now the science of transmigration of the atma or immortal soul from jiva to jiva or embodied being is explained. When the postive and negative karma or reactions to actions that one has performed has been calculated and tabulated along with the types of food one has eaten throughout their life a jiva obtains birth in an appropriate womb and acquires a new body taking along with it in a subtle body the mind and the senses from the previous body. This can be understood by the analogy Lord Krishna gives of a breeze transporting to another location the fragrances of the flowers it has come into contact with. So the subtle body of the jiva containing the mind and the senses transports itself from body to body.

Brahma Vaishnava Sampradaya - Commentary

When a jiva or embodied being due to the mercy of the Vaisnava spiritual master, attains the auspiciousness of bhakti or exclusive loving devotion unto the Supreme Lord Krishna at that time the Supreme Lord Himself as paramatma the Supreme Soul inconceivably resides simultaneously within the etheric heart of every jiva or embodied being commences to direct the actions of that blessed disciple of His servitor, the Vaisnava spiritual master, who guides and instructs through his words and actions. Although the Supreme Lord is continuously entering and departing each and every womb along with every jiva and atma, he does not desire any recompense for this. In the Moksa Dharma known also as the Mahabharata it is stated: Even though the jiva witnesses the temporal emotions, merits and demerits and knows what is ultimately beneficial it is powerless to oppose them. Even though moving hither and thither to the four corners of the planet, enjoying here and suffering there, all actions are actually energised by the Supreme Lord. Even when conquering and winning if one considers themselves a great personality, factually they are only performing as ordained by the Supreme Lord. Even as a vehicle controlled by someone moves a passenger from one location to another. In the same manner the jiva transmigrates from one body to another controlled by the potency of the Supreme Lord.

Shri Vaishnava Sampradaya - Commentary

Whatever body a jiva or embodied being is subjected to reside in and whatever body they depart from; the atma or immortal soul is automatically accompanied by the five senses and the mind. Lord Krishna explains this process as similar to a breeze which picks up the scents of flowers carrying them through through the air from one location to another.

Kumara Vaishnava Sampradaya - Commentary

Whatever body a jiva or embodied being is subjected to reside in and whatever body they depart from; the atma or immortal soul is automatically accompanied by the five senses and the mind. Lord Krishna explains this process as similar to a breeze which picks up the scents of flowers carrying them through through the air from one location to another.

Transliteration Bhagavad Gita 15.8

Shareeram yadavaapnoti yacchaapyutkraamateeshwarah; Griheetwaitaani samyaati vaayurgandhaanivaashayaat.

Word Meanings Bhagavad Gita 15.8

śharīram—the body; yat—as; avāpnoti—carries; yat—as; cha api—also; utkrāmati—leaves; īśhvaraḥ—the Lord of the material body, the embodied soul; gṛihītvā—taking; etāni—these; sanyāti—goes away; vāyuḥ—the air; gandhān—fragrance; iva—like; āśhayāt—from seats