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Bhagavad Gita Chapter 12 Verse 7

भगवद् गीता अध्याय 12 श्लोक 7

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्।।12.7।।

हिंदी अनुवाद - स्वामी रामसुख दास जी ( भगवद् गीता 12.7)

।।12.7।।हे पार्थ मेरेमें आविष्ट चित्तवाले उन भक्तोंका मैं मृत्युरूप संसारसमुद्रसे शीघ्र ही उद्धार करनेवाला बन जाता हूँ।

हिंदी टीका - स्वामी रामसुख दास जी

।।12.7।। व्याख्या --   तेषामहं समुद्धर्ता ৷৷. मय्यावेशितचेतसाम् -- जिन साधकोंका लक्ष्य? उद्देश्य? ध्येय,भगवान् ही बन गये हैं और जिन्होंने भगवान्में ही अनन्य प्रेमपूर्वक अपने चित्तको लगा दिया है तथा जो स्वयं भी भगवान्में ही लग गये हैं? उन्हींके लिये यहाँ मय्यावेशितचेतसाम् पद आया है।जैसे समुद्रमें जलहीजल होता है? ऐसे ही संसारमें मौतहीमौत है। संसारमें उत्पन्न होनेवाली कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है? जो कभी क्षणभरके लिये भी मौतके थपेड़ोंसे बचती हो अर्थात् उत्पन्न होनेवाली प्रत्येक वस्तु प्रतिक्षण मौतके तरफ ही जा रही है। इसलिये संसारको मृत्युसंसारसागर कहा गया है।मनुष्यमें अनुकूल और प्रतिकूल -- दोनों वृत्तियाँ रहती हैं। संसारकी घटना? परिस्थिति तथा प्राणीपदार्थोंमें अनुकूलप्रतिकूल वृत्तियाँ रागद्वेष उत्पन्न करके मनुष्यको संसारमें बाँध देती हैं (गीता 7। 27)। यहाँतक देखा जाता है कि साधक भी सम्प्रदायविशेष और संतविशेषमें अनुकूलप्रतिकूल भावना करके रागद्वेषके शिकार बन जाते हैं? जिससे वे संसारसमुद्रसे जल्दी पार नहीं हो पाते। कारण कि तत्त्वको चाहनेवाले साधकके लिये साम्प्रदायिकताका पक्षपात बहुत बाधक है। सम्प्रदायका मोहपूर्वक आग्रह मनुष्यको बाँधता है। इसलिये गीतामें भगवान्ने जगहजगह इन द्वन्द्वों(राग और द्वेष) से छूटनेके लिये विशेष जोर दिया है (टिप्पणी प0 635.1)।यदि साधक भक्त अपनी सारी अनुकूलताएँ भगवान्में कर ले अर्थात् एकमात्र भगवान्से ही अनन्य प्रेमका सम्बन्ध जोड़ ले और सारी प्रतिकूलताएँ संसारमें कर ले अर्थात् संसारकी सेवा करके अनुकूलताकी इच्छासे विमुख हो जाय? तो वह इस संसारबन्धनसे बहुत जल्दी मुक्त हो सकता है। संसारमें अनुकूल और प्रतिकूल वृत्तियोंका होना ही संसारमें बँधना है।भगवान्का यह सामान्य नियम है कि जो जिस भावसे उनकी शरण लेता है? उसी भावसे भगवान् भी उसको आश्रय देते हैं -- ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् (गीता 4। 11)। अतः वे कहते हैं कि यद्यपि मैं सबमें समभावसे स्थित हूँ -- समोऽहं सर्वभूतेषु (गीता 9। 29)? तथापि जिनको एकमात्र प्रिय मैं हूँ? जो मेरे लिये ही सम्पूर्ण कर्म करते हैं और मेरे परायण होकर नित्यनिरन्तर मेरे ही ध्यानजपचिन्तन आदिमें लगे रहते हैं? ऐसे भक्तोंका मैं स्वयं मृत्युसंसारसागरसे बहुत जल्दी और सम्यक् प्रकारसे उद्धार कर देता हूँ (टिप्पणी प0 635.2)। सम्बन्ध --   भगवान्ने दूसरे श्लोकमें सगुणउपासकोंको श्रेष्ठ योगी बताया तथा छठे और सातवें श्लोकमें यह बात कही कि ऐसे भक्तोंका मैं शीघ्र उद्धार करता हूँ। इसलिये अब भगवान् अर्जुनको ऐसा श्रेष्ठ योगी बननेके लिये पहले आठवें श्लोकमें समर्पणयोगरूप साधनका वर्णन करके फिर नवें? दसवें और ग्यारहवें श्लोकमें क्रमशः अभ्यासयोग? भगवदर्थ कर्म और सर्वकर्मफलत्यागरूप साधनोंका वर्णन करते हैं।