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Bhagavad Gita Chapter 12 Verse 12

भगवद् गीता अध्याय 12 श्लोक 12

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्।।12.12।।

हिंदी अनुवाद - स्वामी रामसुख दास जी ( भगवद् गीता 12.12)

।।12.12।।अभ्याससे शास्त्रज्ञान श्रेष्ठ है? शास्त्रज्ञानसे ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यानसे भी सब कर्मोंके फलका त्याग श्रेष्ठ है। कर्मफलत्यागसे तत्काल ही परमशान्ति प्राप्त हो जाती है।

हिंदी अनुवाद - स्वामी तेजोमयानंद

।।12.12।। अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है ज्ञान से श्रेष्ठ ध्यान है और ध्यान से भी श्रेष्ठ कर्मफल त्याग है त्याग से तत्काल ही शान्ति मिलती है।।

हिंदी टीका - स्वामी रामसुख दास जी

।।12.12।। व्याख्या --   [भगवान्ने आठवें श्लोकसे ग्यारहवें श्लोकतक एकएक साधनमें असमर्थ होनेपर क्रमशः समर्पणयोग? अभ्यासयोग? भगवदर्थ कर्म और कर्मफलत्याग -- ये चार साधन बताये। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि क्रमशः पहले साधनकी अपेक्षा आगेका साधन नीचे दर्जेका है? और अन्तमें कहा गया कर्मफलत्यागका साधन सबसे नीचे दर्जेका है। इस बातकी पुष्टि इससे भी होती है कि पहलेके तीन साधनोंमें भगवत्प्राप्तिरूप फलकी बात (निवसिष्यसि मय्येव? मामिच्छाप्तुम् तथा सिद्धिमवाप्स्यसि -- इन पदोंद्वारा) साथसाथ कही गयी परन्तु ग्यारहवें श्लोकमें जहाँ कर्मफलत्याग करनेकी आज्ञा दी गयी है? वहाँ उसका फल भगवत्प्राप्ति नहीं बताया गया।उपर्युक्त धारणाओंको दूर करनेके लिये यह बारहवाँ श्लोक कहा गया है। इसमें भगवान्ने कर्मफलत्यागको श्रेष्ठ और तत्काल परमशान्ति देनेवाला बताया है? जिससे कि इस चौथे साधनको कोई निम्न श्रेणीका न समझ ले। कारण कि इस साधनमें आसक्ति? ममता और फलेच्छाके त्यागकी ही प्रधानता होनेसे जिस तत्त्वकी प्राप्ति समर्पणयोग? अभ्यासयोग एवं भगवदर्थ कर्म करनेसे होती है? ठीक उसी तत्त्वकी प्राप्ति कर्मफलत्यागसे भी होती है।वास्तवमें उपर्युक्त चारों साधन स्वतन्त्रतासे भगवत्प्राप्ति करानेवाले हैं। साधकोंकी रुचि? विश्वास और योग्यताकी भिन्नताके कारण ही भगवान्ने आठवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक अलगअलग साधन कहे हैं।जहाँतक कर्मफलत्यागके फल(भगवत्प्राप्ति) को अलगसे बारहवें श्लोकमें कहनेका प्रश्न है? उसमें यही विचार करना चाहिये कि समर्पणयोग? अभ्यासयोग एवं भगवदर्थ कर्म करनेसे भगवत्प्राप्ति होती है? यह तो प्रायः प्रचलित ही है किंतु कर्मफलत्यागसे भी भगवत्प्राप्ति होती है? यह बात प्रचलित नहीं है। इसीलिये प्रचलित साधनोंकी अपेक्षा इसकी श्रेष्ठता बतानेके लिये बारहवाँ श्लोक कहा गया है और उसीमें कर्मफलत्यागका फल कहना उचित प्रतीत होता है।]श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासात् -- महर्षि पतञ्जलि कहते हैं -- तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः। (योगदर्शन 1। 13) अर्थात् किसी एक विषयमें स्थिति (स्थिरता) प्राप्त करनेके लिये बारबार प्रयत्न करनेका नाम अभ्यास है। यहाँ (इस श्लोकमें) अभ्यास शब्द केवल अभ्यासरूप क्रियाका वाचक है? अभ्यासयोगका वाचक नहीं क्योंकि इस (प्राणायाम? मनोनिग्रह आदि) अभ्यासमें शास्त्रज्ञान और ध्यान नहीं है तथा कर्मफलकी इच्छाका त्याग भी नहीं है। जडतासे सम्बन्धविच्छेद होनेपर ही योग होता है? जबकि उपर्युक्त अभ्यासमें जडता(शरीर?,इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि) का आश्रय रहता है।यहाँ ज्ञान शब्दका अर्थ शास्त्रज्ञान है? तत्त्वज्ञान नहीं क्योंकि तत्त्वज्ञान तो सभी साधनोंका फल है। अतः यहाँ जिस ज्ञानकी अभ्याससे तुलना की जा रही है? उस ज्ञानमें न तो अभ्यास है? न ध्यान है और न कर्मफलत्याग ही है। जिस अभ्यासमें न ज्ञान है? न ध्यान है और न कर्मफलत्याग ही है -- ऐसे अभ्यासकी अपेक्षा उपर्युक्त ज्ञान ही श्रेष्ठ है।शास्त्रोंके अध्ययन और सत्सङ्गके द्वारा आध्यात्मिक जानकारीको तो प्राप्त कर ले? पर न तो उसके अनुसार वास्तविक तत्त्वका अनुभव करे और न ध्यान? अभ्यास और कर्मफलत्यागरूप किसी साधनका अनुष्ठान ही करे -- ऐसी (केवल शास्त्रोंकी) जानकारीके लिये यहाँ ज्ञानम् पद आया है। इस ज्ञानको उपर्युक्त अभ्यासकी अपेक्षा श्रेष्ठ कहनेका तात्पर्य यह है कि आध्यात्मिक ज्ञानसे रहित अभ्यास भगवत्प्राप्तिमें उतना सहायक नहीं होता? जितना अभ्याससे रहित ज्ञान सहायक होता है। कारण कि ज्ञानसे भगवत्प्राप्तिकी अभिलाषा जाग्रत् हो सकती है? जिससे संसारसे ऊँचा उठना जितना सुगम हो सकता है? उतना अभ्यासमात्रसे नहीं।ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते -- यहाँ ध्यान शब्द केवल मनकी एकाग्रतारूप क्रियाका वाचक है? ध्यानयोगका वाचक नहीं। इस ध्यानमें शास्त्रज्ञान और कर्मफलत्याग नहीं है। ऐसा ध्यान उस ज्ञानकी अपेक्षा श्रेष्ठ है? जिस ज्ञानमें अभ्यास? ध्यान और कर्मफलत्याग नहीं है। कारण कि ध्यानसे मनका नियन्त्रण होता है? जब कि केवल शास्त्रज्ञानसे मनका नियन्त्रण नहीं होता। इसलिये मननियन्त्रणके कारण ध्यानसे जो शक्ति सञ्चित होती है? वह शास्त्रज्ञानसे नहीं होती। यदि साधक उस शक्तिका सदुपयोग करके परमात्माकी तरफ बढ़ना चाहे? तो जितनी सुगमता उसको होगी? उतनी शास्त्रज्ञानवालेको नहीं। इसके साथसाथ ध्यान करनेवाले साधकको (अगर वह शास्त्रका अध्ययन करे? तो) मनकी एकाग्रताके कारण वास्तविक ज्ञानकी प्राप्ति बहुत सुगमतासे हो सकती है? जबकि केवल शास्त्राध्यायी साधकको (चाहनेपर भी) मनकी चञ्चलताके कारण ध्यान लगानेमें कठनिता होती है। [आजकल भी देखा जाय तो शास्त्रका अध्ययन करनेवाले आदमी जितने मिलते हैं? उतने मनकी एकाग्रताके लिये उद्योग करनेवाले नहीं मिलते।]ध्यानात्कर्मफलत्यागः -- ज्ञान और कर्मफलत्यागसे रहित ध्यानकी अपेक्षा ज्ञान और ध्यानसे रहित,कर्मफलत्याग श्रेष्ठ है। यहाँ कर्मफलत्यागका अर्थ कर्मों तथा कर्मफलोंका स्वरूपसे त्याग नहीं है? प्रत्युत कर्मों और उनके फलोंमें ममता? आसक्ति और कामनाका त्याग ही है।उत्पत्तिविनाशशील सबकीसब वस्तुएँ कर्मफल हैं। उनकी आसक्तिका त्याग करना ही सम्पूर्ण कर्मोंके फलोंका त्याग करना है।कर्मोंमें आसक्ति और फलेच्छा ही संसारमें बन्धनका कारण है। आसक्ति और फलेच्छा न रहनेसे कर्मफलत्यागी पुरुष सुगमतापूर्वक संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है।शरीर? इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि? योग्यता? सामर्थ्य? पदार्थ आदि जो कुछ मनुष्यके पास है? वह सबकासब संसारसे ही मिला हुआ है? उसका व्यक्तिगत नहीं है। इसलिये कर्मफलत्यागी अर्थात् कर्मयोगी मिली हुई (शरीरादि) सब सामग्रीको अपनी और अपने लिये न मानकर उसको निष्कामभावपूर्वक संसारकी ही सेवामें लगा देता है। इस प्रकार मिली हुई साम्रगी(जडता) का प्रवाह संसार(जडता) की ही तरफ हो जानेसे उसका जडतासे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाता है और उसको परमात्मासे अपने स्वाभाविक और नित्यसिद्ध सम्बन्धका अनुभव हो जाता है। इसलिये कर्मयोगीके लिये अलगसे ध्यान लगानेकी जरूरत नहीं है। अगर वह ध्यान लगाना भी चाहे? तो कोई सांसारिक कामना न होनेके कारण वह सुगमतापूर्वक ध्यान लगा सकता है? जब कि सकामभावके कारण सामान्य साधकको ध्यान लगानेमें कठिनाई होती है।गीताके छठे अध्यायमें (ध्यानयोगके प्रकरणमें) भगवान्ने बताया है कि ध्यानका अभ्यास करतेकरते अन्तमें जब साधकका चित्त एकमात्र परमात्मामें अच्छी तरहसे स्थित हो जाता है? तब वह सम्पूर्ण कामनाओंसे रहित हो जाता है और चित्तके उपराम होनेपर वह स्वयंसे परमात्मतत्त्वमें स्थित हो जाता है (6। 18 -- 20)। परन्तु कर्मयोगी सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके तत्काल स्वयंसे परमात्मतत्त्वमें स्थित हो जाता है (गीता 2। 55)। कारण यह है कि ध्यानमें परमात्मामें चित्त लगाया जाता है? इसलिये उसमें चित्त(जडता) का आश्रय रहनेके कारण चित्त(जडता) के साथ बहुत दूरतक सम्बन्ध बना रहता है। परन्तु कर्मयोगमें ममता और कामनाका त्याग किया जाता है? इसलिये उसमें ममता और कामना(जडता) का त्याग करनेके साथ ही चित्त(जडता) का भी स्वतः त्याग हो जाता है। इसलिये परिणाममें समानरूपसे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होनेपर भी ध्यानका अभ्यास करनेवाले साधकको ध्येयमें चित्त लगानेमें कठिनाई होती है तथा उसे परमात्मतत्त्वका अनुभव भी देरीसे होता है? जब कि कर्मयोगीको परमात्मतत्त्वका अनुभव सुगमतापूर्वक तथा शीघ्रतासे होता है। इससे सिद्ध होता है कि ध्यानकी अपेक्षा कर्मयोगका साधन श्रेष्ठ है।अपना कुछ नहीं? अपने लिये कुछ नहीं चाहिये और अपने लिये कुछ नहीं करना है -- यही कर्मयोगका मूल महामन्त्र है? जिसके कारण यह सब साधनोंसे विलक्षण हो जाता है -- कर्मयोगो विशिष्यते (गीता 5। 2)।त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् -- यहाँ त्यागात् पद कर्मफलत्यागके लिये ही आया है। त्यागके स्वरूपको विशेषरूपसे समझनेकी आवश्यकता है। त्याग न तो उसका हो सकता है? जो अपना स्वरूप है और न उसीका हो सकता है? जिसके साथ अपना सम्बन्ध नहीं है। जैसे? अपना स्वरूप होनेके कारण प्रकाश और उष्णतासे सूर्यका वियोग नहीं हो सकता? और जिससे वियोग नहीं हो सकता? उसका त्याग करना असम्भव है। इसके विपरीत अपना स्वरूप न होनेके कारण अन्धकार और शीतलतासे सूर्यका वियोग भी कहना नहीं बनता क्योंकि अपना स्वरूप न होनेके कारण उनका वियोग अथवा त्याग नित्य और स्वतःसिद्ध है। इसलिये वास्तवमें त्याग उसीका होता है? जो अपना नहीं है? पर भूलसे अपना मान लिया गया है।जीव स्वयं चेतन और अविनाशी है तथा संसार जड और विनाशी है। जीव भूलसे (अपने अंशी परमात्माको भूलकर) विजातीय संसारको अपना मान लेता है। इसलिये संसारसे माने हुए सम्बन्धका ही त्याग करनेकी आवश्यकता है।त्याग असीम होता है। संसारके सम्बन्धमें तो सीमा होती है? पर संसारके त्याग(सम्बन्धविच्छेद) में सीमा नहीं होती। तात्पर्य है कि जिन वस्तुओंसे हम अपना सम्बन्ध जोड़ते हैं? उन वस्तुओंकी तो सीमा होती है? पर उन वस्तुओंका त्याग असीम होता है। त्याग करते ही परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है। परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति भी असीम होती है। कारण कि परमात्मतत्त्व देश? काल? वस्तु? व्यक्ति आदिकी सीमासे रहित (असीम) है। सीमित वस्तुओंके मोहके कारण ही उस असीम परमात्मतत्त्वका अनुभव नहीं होता।कर्मफलत्याग में संसारसे माने हुए सम्बन्धका त्याग हो जाता है। इसलिये यहाँ त्यागात् पद कर्मों और उनके फलों (संसार) के साथ भूलसे माने हुए सम्बन्धका त्याग करनेके अर्थमें ही आया है। यही त्यागका वास्तविक स्वरूप है।त्यागके अन्तर्गत जप? भजन? ध्यान? समाधि आदिके फलका त्याग भी समझना चाहिये। कारण कि जबतक जप? भजन? ध्यान? समाधि अपने लिये की जाती है? तबतक व्यक्तित्व बना रहनेसे बन्धन बना रहता है। अतः अपने लिये किया हुआ ध्यान? समाधि आदि भी बन्धन ही है। इसलिये किसी भी क्रियाके साथ अपने लिये कुछ भी चाह न रखना ही त्याग है। वास्तविक त्यागमें त्यागवृत्तिसे भी सम्बन्धविच्छेद हो जाता है।यहाँ शान्तिः पदका तात्पर्य परमशान्तिकी प्राप्ति है। इसीको भगवत्प्राप्ति कहते हैं।अभ्यास? ज्ञान और ध्यान -- तीनों साधनोंसे वस्तुतः कर्मफलत्यागरूप साधन श्रेष्ठ है। जबतक साधकमें फलकी आसक्ति रहती है? तबतक वह (जडताका आश्रय रहनेसे) मुक्त नहीं हो सकता ( गीता 5। 12)। इसलिये फलासक्तिके त्यागकी जरूरत अभ्यास? ज्ञान और ध्यान -- तीनों ही साधनोंमें है। जडता अर्थात् उत्पत्तिविनाशशील वस्तुओंका सम्बन्ध ही अशान्तिका खास कारण है। कर्मफलत्याग अर्थात् कर्मयोगमें आरम्भसे ही कर्मों और उनके फलोंमें आसक्तिका त्याग किया जाता है (गीता 5। 11)। इसलिये जडताका सम्बन्ध न रहनेसे कर्मयोगीको शीघ्र परमशान्तिकी प्राप्ति हो जाती है (गीता 5। 12)।कर्मफलत्यागसम्बन्धी विशेष बातकर्मफलत्याग कर्मयोगका ही दूसरा नाम है। कारण कि कर्मयोगमें कर्मफलत्याग ही मुख्य है। यह कर्मयोग भगवान् श्रीकृष्णके अवतारसे बहुत पहले ही लुप्तप्राय हो गया था (गीता 4। 2)। भगवान्ने अर्जुनको निमित्त बनाकर कृपापूर्वक इस कर्मयोगको पुनः प्रकट किया (गीता 4। 3)। भगवान्ने इसको प्रकट करके प्रत्येक परिस्थितिमें प्रत्येक मनुष्यको कल्याणका अधिकार प्रदान किया? अन्यथा अध्यात्ममार्गके विषयमें कभी यह सोचा ही नहीं जा सकता कि एकान्तके बिना? कर्मोंको छोड़े बिना? वस्तुओंका त्याग किये बिना? स्वजनोंके त्यागके बिना -- प्रत्येक परिस्थितिमें मनुष्य अपना कल्याण कर सकता हैकर्मयोगमें फलासक्तिका त्याग ही मुख्य है। स्वस्थताअस्वस्थता? धनवत्तानिर्धनता? मानअपमान? स्तुतिनिन्दा आदि सभी अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितियाँ कर्मोंके फलरूपमें आती हैं। इनके साथ रागद्वेष रहनेसे कभी परमात्माकी प्राप्ति नहीं हो सकती (गीता 2। 42 -- 44)।उत्पन्न होनेवाली मात्र वस्तुएँ कर्मफल हैं। जो फलरूपमें मिला है? वह सदा रहनेवाला नहीं होता क्योंकि जब कर्म सदा नहीं रहता? तब उससे उत्पन्न होनेवाला फल सदा कैसे रहेगा इसलिये उसमें आसक्ति? ममता करना भूल ही है। जो फल कभी नहीं मिला है? उसकी कामना करना भी भूल है। अतः फलासक्तिका त्याग कर्मयोगका बीज है।कर्मयोगमें क्रियाओंकी प्रधानता प्रतीत होती है और शरीरादि जड पदार्थोंके बिना क्रियाओंका होना सम्भव नहीं है? इसलिये कर्मों एवं फलोंसे छुटकारा पाना कठिन मामूल देता है। परन्तु वास्तवमें देखा जाय तो मिली हुई कर्मसामग्री(शरीरादि जडपदार्थों) को अपनी तथा अपने लिये माननेसे ही फलासक्तिका त्याग कठिन मालूम देता है। शरीरादि प्राप्तसामग्रीमें किसी प्रकारकी आसक्ति न रखकर कर्तव्यकर्म करनेसे परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है (गीता 3। 19)। वास्तवमें क्रियाएँ कभी बन्धनकारक नहीं होतीं। बन्धनका मूल हेतु कामना और फलासक्ति है। कामना और फलासक्तिके मिटनेपर सभी कर्म अकर्म हो जाते हैं ( गीता 4। 19 -- 23)।भगवान्ने कर्मयोगको कर्मसंन्याससे भी श्रेष्ठ बताया है (गीता 5। 2)। भगवान्के मतमें स्वरूपसे कर्मोंका त्याग करनेवाला व्यक्ति संन्यासी नहीं है? प्रत्युत कर्मफलका आश्रय न लेकर कर्तव्यकर्म करनेवाला कर्मयोगी ही संन्यासी है (गीता 6। 1)। आसक्तिरहित कर्मयोगी सभी संकल्पोंसे मुक्त होकर सुगमतापूर्वक योगारूढ़ हो जाता है (गीता 6। 4)। इसके विपरीत जो कर्मों तथा उनके फलोंको अपना और अपने लिये मानकर सुखभोगकी इच्छा रखते हैं? वे वास्तवमें पापका ही भोग करते हैं (गीता 3। 13)। अतः फलासक्ति ही संसारमें बन्धनका मुख्य कारण है -- फले सक्तो निबध्यते (गीता 5। 12)। इसका त्याग ही वास्तवमें त्याद है (गीता 18। 11)।गीता फलासक्तिके त्यागपर जितना जोर देती है? उतना और किसी साधनपर नहीं। दूसरे साधनोंका वर्णन करते समय भी कर्मफलत्यागको उनके साथ रखा गया है। भगवान्के मतानुसार त्याग वही है? जिसमें निष्कामभावसे अपने कर्तव्यका पालन हो और फलोंमें किसी प्रकारकी आसक्ति न हो (गीता 18। 6)। उत्तमसेउत्तम कर्मोंमें भी आसक्ति न हो और साधारणसेसाधारण कर्मोंमें भी द्वेष न हो क्योंकि कर्म तो उत्पन्न होकर समाप्त हो जायँगे? पर उनमें होनेवाली आसक्ति (राग) और द्वेष रह जायगा? जो बन्धनका हेतु है। इसके विपरीत अहंभाव तथा रागद्वेषसे रहित मनुष्यके सामने समस्त प्राणियोंका संहाररूप कर्तव्यकर्म भी आ जाय? तो भी वह बँध नहीं सकता (गीता 18। 17)। इसीलिये भगवान् कर्मफलत्याग को तप? ज्ञान? कर्म? अभ्यास? ध्यान आदि साधनोंसे श्रेष्ठ बताते हैं। दूसरे साधनोंमें क्रियाएँ तो उत्तम प्रतीत होती हैं? पर विशेष लाभ दिखायी नहीं देता तथा श्रम भी करना पड़ता है। परन्तु फलासक्तिका त्याग कर देनेपर न तो कोई नये कर्म करने पड़ते हैं? न आश्रम? देश आदिका परिवर्तन ही करना पड़ता है? प्रत्युत साधक जहाँ है? जो करता है? जैसी परिस्थितिमें है? उसीमें (फलासक्तिके त्यागसे) बहुत सुगमतासे अपना कल्याण कर सकता है।नित्यप्राप्त परमात्माकी अनुभूति होती है? प्राप्ति नहीं। जहाँ परमात्माकी प्राप्ति कहा जाता है? वहाँ उसका अर्थ नित्यप्राप्तकी प्राप्ति या अनुभव ही मानना चाहिये। वह प्राप्ति साधनोंसे नहीं होती? प्रत्युत जडताके त्यागसे होती है। ममता? कामना और आसक्ति ही जडता है। शरीर? मन? इन्द्रियाँ? पदार्थ आदिको मैं या मेरा मानना ही जडता है। ज्ञान? अभ्यास? ध्यान? तप आदि साधन करतेकरते जब जडतासे सम्बन्धविच्छेद होता है? तभी नित्यप्राप्त परमात्माकी अनुभूति होती है। इस जडताका त्याग जितना कर्मफलत्यागसे अर्थात् कर्मयोगसे सुगम होता है? उतना ज्ञान? अभ्यास? ध्यान? तप आदिसे नहीं। कारण कि ज्ञानादि साधनोंमें शरीरादिको अपना और साधनको अपने लिये मानते रहनेसे जडता(शरीर? मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ) से विशेष सम्बन्ध बना रहता है। इन साधनोंका लक्ष्य परमात्मप्राप्ति होनेसे आखिरमें सफलता तो मिल जाती है किन्तु उसमें देरी और कठिनाई होती है। परन्तु कर्मयोगमें आरम्भसे ही जडताके त्यागका लक्ष्य रहता है। जडताका सम्बन्ध ही नित्यप्राप्त परमात्माकी अनुभूतिमें प्रधान बाधा है -- यह बात अन्य साधनोंमें स्पष्ट प्रतीत नहीं होती। जब साधक यह दृढ़ निश्चय कर लेता है कि मेरेको कभी किसी परिस्थितिमें मन? वाणी अथवा क्रियासे चोरी? झूठ? व्यभिचार? हिंसा? छल? कपट? अभक्ष्यभक्षण आदि कोई शास्त्रविरुद्ध कर्म नहीं करने हैं? तब उसके द्वारा स्वतः विहित कर्म होने लगते हैं।साधकको निषिद्ध कर्मोंके त्यागका ही निश्चय करना चाहिये? न कि विहित कर्मोंको करनेका। कारण कि अगर साधक विहित कर्मोंको करनेका निश्चय करता है? तो उसमें विहित कर्म करनेका अभिमान आ जायगा? जिससे उसका अहम् सुरक्षित रहेगा। विहित कर्म करनेका अभिमान रहनेसे निषिद्ध कर्म होते हैं। परन्तु मैं निषिद्ध कर्म नहीं करूँगा इस निषेधात्मक निश्चयमें किसी योग्यता? सामर्थ्यकी अपेक्षा न रहनेके कारण साधकमें अभिमान नहीं आता। निषिद्ध कर्मोंके त्यागमें भी मूर्खतासे अभिमान आ सकता है। अभिमान आनेपर विचार करे कि जो नहीं करना चाहिये? वह नहीं किया तो इसमें विशेषता किस बातकी फलकी कामना भी तभी होती है? जब कुछ किया जाता है। जब कुछ किया ही नहीं? केवल निषिद्ध कर्मका त्याग ही किया है (टिप्पणी प0 646)? तब फलकी कामना क्यों होगी अतः करनेका अभिमान न रहनेसे फलासक्तिका त्याग स्वतः हो जाता है। फलासक्तिका त्याग होनेपर शान्ति स्वतःसिद्ध है।साधनसम्बन्धी विशेष बातभगवान्ने नवें? दसवें और ग्यारहवें श्लोकमें क्रमशः जो तीन साधन (अभ्यासयोग? भगवदर्थकर्म और कर्मफलत्याग) बताये हैं? विचारपूर्वक देखा जाय तो उनमेंसे (कर्मफलत्यागको छोड़कर) प्रत्येक साधनमें शेष दोनों साधन भी आ जाते हैं जैसे -- (1) अभ्यासयोगमें भगवान्के लिये भजन? नामजप आदि क्रियाएँ करनेसे वह भगवदर्थ है ही और नाशवान् फलकी कामना न होनेसे उसमें कर्मफलत्याग भी है? (2) भगवदर्थकर्ममें भगवान्के लिये कर्म होनेसे अभ्यासयोग भी है और नाशवान् फलकी कामना न होनेसे कर्मफलत्याग भी है।वास्तवमें साधकको सबसे पहले अपने लक्ष्य? ध्येय अथवा उद्देश्यको दृढ़ करना चाहिये। इसके बाद उसे यह पहचानना चाहिये कि उसका सम्बन्ध वास्तवमें किसके साथ है। फिर चाहे कोई भी साधन करे -- अभ्यास करे? भगवत्प्रीत्यर्थ कर्म करे अथवा कर्मफलत्याग करे? वही साधन उसके लिये श्रेष्ठ हो जायगा। जब साधकका यह लक्ष्य हो जायगा कि उसे भगवान्को ही प्राप्त करना है और वह यह भी पहचान लेगा कि अनादिकालसे उसका भगवान्के साथ स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है? तब कोई भी साधन उसके लिये छोटा नहीं रह जायगा। किसी साधनका छोटा या बड़ा होना लौकिक दृष्टिसे ही है। वास्तवमें मुख्यता उद्देश्यकी ही है। अतः साधकको चाहिये कि वह अपने उद्देश्यमें कभी किञ्चिन्मात्र भी शिथिलता न आने दे।किसी साधनकी सुगमता या कठिनता साधककी रुचि और उद्देश्य पर निर्भर करती है। रुचि और उद्देश्य एक भगवान्का होनेसे साधन सुगम होता है तथा रुचि संसारकी और उद्देश्य भगवान्का होनेसे साधन कठिन हो जाता है।जैसे? भूख सबकी एक ही होती है और भोजन करनेपर तृप्तिका अनुभव भी सबको एक ही होता है? पर भोजनकी रुचि सबकी भिन्नभिन्न होनेके कारण भोज्यपदार्थ भी भिन्नभिन्न होते हैं। इसी तरह साधकोंकी रुचि? विश्वास और योग्यताके अनुसार साधन भी भिन्नभिन्न होते हैं? पर भगवान्की अप्राप्तिका दुःख तथा भगवत्प्राप्तिकी अभिलाषा (भूख) सभी साधकोंमें एक ही होती है। साधक चाहे किसी भी श्रेणीका क्यों न हो? साधनकी पूर्णताके बाद भगवत्प्राप्तिरूप आनन्दकी अनुभूति (तृप्ति) भी सबको एकजैसी ही होती है।इस प्रकरणमें अर्जुनको निमित्त बनाकर भगवान्ने मनुष्यमात्रके कल्याणके लिये चार साधन बताये हैं -- (1) समर्पणयोग? (2) अभ्यासयोग? (3) भगवान्के लिये ही सम्पूर्ण कर्मोंका अनुष्ठान और (4) सर्वकर्मफलत्याग। यद्यपि चारों साधनोंका फल भगवत्प्राप्ति ही है? तथापि साधकोंमें रुचि? श्रद्धाविश्वास और योग्यताकी भिन्नताके कारण ही भिन्नभिन्न साधनोंका वर्णन हुआ है। वास्तवमें चारों ही साधन समानरूपसे स्वतन्त्र और श्रेष्ठ हैं। इसलिये साधक जो भी साधन अपनाये? उसे उस साधनको सर्वोपरि मानना चाहिये।अपने साधनको किसी भी तरह हीन (निम्नश्रेणीका) नहीं मानना चाहिये और साधनकी सफलता(भगवत्प्राप्ति) के विषयमें कभी निराश भी नहीं होना चाहिये क्योंकि कोई भी साधन निम्नश्रेणीका नहीं होता। अगर साधकका एकमात्र उद्देश्य भगवत्प्राप्ति हो? साधन उसकी रुचि? विश्वास तथा योग्यताके अनुसार हो? साधन पूरी सामर्थ्य और तत्परता(लगन) से किया जाय और भगवत्प्राप्तिकी उत्कण्ठा भी तीव्र हो तो सभी साधन एक समान हैं। साधकको उद्देश्य? सामर्थ्य और तत्परताके विषयमें कभी हतोत्साह नहीं होना चाहिये। भगवान् साधकसे इतनी ही अपेक्षा रखते हैं कि वह अपनी पूरी सामर्थ्य और योग्यताको साधनमें लगा दे। साधक चाहे भगवत्तत्त्वको ठीकठीक न जाने? पर सर्वज्ञ भगवान् तो उसके उद्देश्य? भाव? सामर्थ्य? तत्परता आदिको अच्छी तरह जानते ही हैं। यदि साधक अपने उद्देश्य? भाव? चेष्टा? तत्परता? उत्कण्ठा आदिमें किसी प्रकारकी कमी न आने दे तो भगवान् स्वयं उसे अपनी प्राप्ति करा देते हैं। वास्तवमें अपने उद्योग? बल? ज्ञान आदिकी कीमतसे भगवान्की प्राप्ति हो ही नहीं सकती। अगर भगवान्के दिये हुए बल? ज्ञान आदिको भगवान्की प्राप्तिके लिये ही लगा दिया जाय तो वे साधकको कृपापूर्वक अपनी प्राप्ति करा देते हैं।संसारमें भगवत्प्राप्ति ही सबसे सुगम है और इसके सभी अधिकारी हैं क्योंकि इसीके लिये मनुष्यशरीर मिला,है। सब प्राणियोंके कर्म भिन्नभिन्न होनेके कारण किन्हीं दो व्यक्तियोंको भी संसारके पदार्थ एक समान नहीं मिल सकते? जब कि (भगवान् एक होनेसे) भगवत्प्राप्ति सबको एक समान ही होती है क्योंकि भगवत्प्राप्ति कर्मजन्य नहीं है।भगवान्की प्राप्तिमें संसारसे वैराग्य और भगवत्प्राप्तिकी उत्कण्ठा -- ये दो बातें ही मुख्य हैं। इन दोनोंमेंसे किसी भी एक साधनके तीव्र होनेपर भगवत्प्राप्ति हो जाती है। फिर भी भगवत्प्राप्तिकी उत्कण्ठामें विशेष शक्ति है।ऊपर जो चार साधन बताये गये हैं? उनमेंसे प्रथम तीन साधन तो मुख्यतः भगवत्प्राप्तिकी उत्कण्ठा जाग्रत् करनेवाले हैं? और चौथा साधन (कर्मफलत्याग) मुख्यतः संसारसे सम्बन्धविच्छेद करनेवाला है।साधन कोई भी हो जब सांसारिक भोग दुःखदायी प्रतीत होने लगेंगे तथा भोगोंका हृदयसे त्याग होगा? तब (लक्ष्य भगवान् होनेसे) भगवान्की ओर स्वतः प्रगति होगी और भगवान्की कृपासे ही उनकी प्राप्ति हो जायगी।इसी तरह जब भगवान् परमप्रिय लगने लगेंगे? उनके बिना रहा नहीं जायगा? उनके वियोगमें व्याकुलता होने लगेगी? तब शीघ्र ही भगवान्की प्राप्ति हो जायगी। सम्बन्ध --   भगवान्ने निर्गुणनिराकार ब्रह्म और सगुणसाकार भगवान्की उपासना करनेवाले उपासकोंमें सगुणउपासकोंको श्रेष्ठ बताकर अर्जुनको सगुणउपासना करनेकी आज्ञा दी। सगुणउपासनाके अन्तर्गत भगवान्ने आठवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक अपनी प्राप्तिके चार साधन बताये। अब तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक भगवान् पाँच प्रकरणोंमें चारों साधनोंसे सिद्धावस्थाको प्राप्त हुए अपने प्रिय भक्तोंके लक्षणोंका वर्णन करते हैं। पहला प्रकरण तेरहवें और चौदहवें दो श्लोकोंका है? जिसमें सिद्ध भक्तके बारह लक्षण बताये गये हैं।,

हिंदी टीका - स्वामी चिन्मयानंद जी

।।12.12।। भ्रमित शिष्य को उपदेश देते समय गुरु के लिए यह पर्याप्त नहीं है कि वह केवल दार्शनिक सत्यों का नाम निर्देश कर उनकी गणना करें। आवश्यकता होती है उन विचारों के एक ऐसी सुन्दर संयोजना की? जिससे विद्यार्थी को सभी विचार पुष्पगुच्छ के समान एक ही स्थान पर प्राप्त हो जायें। इससे तत्त्व को समझने में सहायता मिलती है। भगवान् श्रीकृष्ण के प्रवचन का विचाराधीन श्लोक एक ऐसा ही उदाहरण विशेष है? जिसमें अब तक किये सैद्धांतिक विवेचन को एक सुसंयोजित विचार पद्धति से प्रस्तुत किया गया है।इस श्लोक में सैद्धांतिक विचारों को उनके महत्त्व की दृष्टि से उतरते क्रम में रखा गया है। एक बार यदि साधना के इस सोपान को साधक भली भाँति समझ लेता है और इस सोपान पर आरोहण व अवरोहण की कला भी सीख लेता है? तो यह माना जा सकता है कि उसने इस अध्याय के विवेचित सभी महत्त्वपूर्ण विषयों को पूर्णरूप से समझ लिया है।अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है आध्यात्मिक साधनाएं केवल शारीरिक क्रियायें नहीं हैं? वरन् उनका प्रय़ोजन हमारे मन और बुद्धि को अर्थात् हमारे आन्तरिक व्यक्तित्व को सुगठित करना है। शरीर से की जाने वाली भक्ति साधना को अन्तकरण का सहयोग तब तक नहीं मिलेगा? जब तक कि साधक को उसके द्वारा की जा रही साधना का सम्यक् ज्ञान नहीं होता। शारीरिक क्रियाओं को मन का भक्तिभावनापूर्ण सहयोग प्राप्त कराने के पूर्व बुद्धि का परिवर्तन अत्यावश्यक होता है। हम जिसका अभ्यास कर रहे हैं और उसका प्रयोजन क्या है? इसका पूर्ण ज्ञान होना योग को सफल बनाने के लिए अपरिहार्य है। इसलिए यहाँ कहा गया है कि केवल यन्त्रवत् साधनाभ्यास करने की अपेक्षा उसके मनोवैज्ञानिक? बौद्धिक और आध्यात्मिक आशयों का ज्ञान होना अधिक श्रेष्ठ और महत्त्वपूर्ण है।ज्ञान से श्रेष्ठ ध्यान है श्रवणादि साधनों से प्राप्त किये गये ज्ञान पर ध्यान करना उस ज्ञान से अधिक श्रेष्ठ है। आध्यात्मिक साधनाओं की प्रक्रिया और प्रय़ोजन के शास्त्रीय ज्ञान को समझने की अपेक्षा उन्हें सीखना अधिक सरल होता है। श्रवण से प्राप्त ज्ञान को आत्मसात् करने के लिए उस पर विचारपूर्वक मनन और ध्यान की आवश्यकता होती है। शास्त्रवाक्यों के केवल शाब्दिक अर्थ को जानने से यह कार्य सम्पादित नहीं हो सकता। इसलिए मनन और निदिध्यासन अनिवार्य़ होते हैं। केवल श्रवण से किये गये ज्ञान से आत्मसात् किया हुआ ज्ञान निश्चित ही अधिक श्रेष्ठ होता है उसे आत्मसात् करने का साधन ध्यान है? इसलिए महत्व के अनुक्रम में ध्यान को ज्ञान की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ कहा गया है।ध्यान से भी श्रेष्ठ कर्मफल त्याग है वर्तमान में प्राप्त ज्ञान की परिसीमा के परे सुदूर स्थित श्रेष्ठतर ज्ञान को प्राप्त करने के लिए उड़ान भरने का बुद्धि का प्रयत्न ही ध्यान कहलाता है। इस उड़ान के लिए बुद्धि के पास शक्ति और सन्तुलन का होना आवश्यक है। उस व्यक्ति के लिए ध्यान का अभ्यास असंभव है? जिसके मन की शक्ति और स्थिरता? भावी फलों की चिन्ता व कल्पना के कारण छिन्नभिन्न हो गयी होती हैं। पूर्व श्लोक की व्याख्या में हम देख चुके हैं कि किस प्रकार भविष्य के प्रति हमारी चिन्ता और व्याकुलता? वर्तमान में कार्य करने की हमारी क्षमता को नष्ट कर देती हैं। सभी कर्मफल भविष्य में ही आते हैं और इनकी चिन्ता करने का अर्थ है? असंख्य म्ाानसिक विक्षेपों को आमन्त्रित करना। इस प्रकार विक्षुब्ध अन्तकरण से कोई भी साधक शास्त्र प्रतिपादित सत्य पर न मनन कर सकता है और न ध्यान। इसलिए यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण कर्मफल त्याग को श्रेष्ठ स्थान प्रदान करते हैं।अपने कथन पर टिप्पणी को जोड़ते हुए भगवान् कहते हैं कि? त्याग से तत्काल शान्ति मिलती है। हिन्दू धर्म में संन्यास का वास्तविक अर्थ यह है कि इन्द्रियों का विषयों के साथ सम्पर्क होने से उत्पन्न होने वाले सुख भोग की बन्धनकारक आसक्तियों को त्याग देना।इस त्याग के परिणामस्वरूप साधक को अन्तकरण की प्रभावशाली शान्ति और स्थिरता प्राप्त होती है। ऐसे शान्त वातावरण में बुद्धि शास्त्र के ज्ञान पर मनन करके उसमें वर्णित आत्मविकास के साधनों को सम्यक् प्रकार से समझ पाती है और इस प्रकार ज्ञानपूर्वक ध्यान का अभ्यास करने पर साधक को निश्चित ही सफलता मिलती है।अब? अक्षर और अव्यक्त की उपासना करने वाले ज्ञानी भक्तजनों के आंतरिक लक्षण? अगले श्लोक में बताये जा रहे हैं? जो साधकों के लिए पूर्णत्व प्राप्ति के उपायभूत साक्षात् साधन हैं

English Translation - Swami Gambirananda

12.12 Knowledge is surely superior to practice; meditation surpasses knowledge. The renunciation of the results of works (excels) meditation. From renunciation, Peace follows immediately.

English Translation - Swami Sivananda

12.12 Better indeed is knowledge than practice; than knowledge meditation is better; than meditation the renunciation of the fruits of actions: peace immediately follows renunciation.

English Translation - Dr. S. Sankaranarayan

12.12. For, knowledge is superior to practice; because of knowledge, meditation becomes pre-eminent; from meditation issues the renunciation of fruits of actions; and to renunciation, peace remains next.

English Commentary - Swami Sivananda

12.12 श्रेयः better? हि indeed? ज्ञानम् knowledge? अभ्यासात् than practice? ज्ञानात् than knowledge? ध्यानम् meditation? विशिष्यते excels? ध्यानात् than meditation? कर्मफलत्यागः the renunciation of the fruits of actions? त्यागात् from renunciation? शान्तिः peace? अनन्तरम् immediately.Commentary Theoretical or indirect knowledge of Brahman gained from the scriptures is better than the practice (of restraining the modifications of the mind or worship of idols or selfmortification for the purpose of control of the mind and the senses) accompained with ignorance. Meditation is better than theoretical knowledge. Renunciation of the fruits of actions is bettern than meditation. Renunciation of the fruits of all actions as a means to the attainment of supreme peace or Moksha is merely eulogised here by the declaration of the superiority of one over the other to encourage Arjuna (and other spiritual aspirants) to practise Nishkama Karma Yoga? to create a strong desire in them to take up the Yoga of selfless action? in the same manner as by saying that the ocean was drunk by the Brahmana sage Agastya even the Brahmanas of this age are extolled because they are also Brahmanas.Desire is an enemy of peace. Desire causes restlessness of the mind. Desire is the source of all human miseries? sorrows and troubles. Stop the play of desire through discrimination? dispassion and eniry into the nature of the Self then you will enjoy supreme peace.Renunciation of the fruits of actions? is prescribed for the purification of the aspirants heart. It annihlates desire? the enemy of wisdom. The sage? too? renounces the fruits of actions. It has become natural to him to do so.

English Translation of Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya's

12.12 Jnanam, knowledge; [Firm conviction about the Self arrived at through Vedic texts and reasoning.] is hi, surely; sreyah, superior; -to what?-abhyasat, to practice [Practice-repeated effort to ascertain the true meaning of Vedic texts, in order to acire knowledge.] which is not preceded by discrimination. Dhyanam, meditation, undertaken along with knowledge; visisyate, surpasses even jnanat, that knowledge. Karma-phala-tyagah, renunciation of the results of works; excels even dhyanat, meditation associated with knowledge. (Excels has to be supplied.) Tyagat, from this renunciation of the results of actions, in the way described before; [By dedicating all actions to God with the idea, May God be pleased.] santih, Peace, the cessation of transmigratory existence together with its cause; follows anantaram, immediately; not that it awaits another accasion. Should the unenlightened person engaged in works be unable to practise the disciplines enjoined earlier, then, for him has been enjoined renunciation of the results of all works as a means to Liberation. But this has not been done at the very beginning. And for this reason renunciation of the results of all works has been praised in, Knowledge is surely superior to practice, etc. by teaching about the successive excellence. For it has been taught as being fit to be adopted by one in case he is unable to practise the disciplines already presented [Presented from verse 3 onwards.] Objection: From what similarly does the eulogy follow? Reply: In the verse, When all desires clinging to ones heart fall off (Ka, 2.3.14), it has been stated that Immortality results from the rejection of all desires. That is well known. And all desires means the result of all rites and duties enjoined in the Vedas and Smrtis. From the renunciation of these, Peace surely comes immediately to the enlightened man who is steadfast in Knowledge. There is a similarity between renunciation of all desires and renunciation of the results of actions by an unenlightened person. Hence, on account of that similarity this eulogy of renunciation of the results of all actions is meant for rousing interest. As for instance, by saying that the sea was drunk up by the Brahmana Agastya, the Brahmanas of the present day are also praised owing to the similarity of Brahminhood. In this way it was been said that Karma-yoga becomes a means for Liberation,since it involves renunciaton of the rewards of works. Here, again, the Yoga consisting in the concentration of mind on God as the Cosmic Person, as also the performance of actions etc. for God, have been spoken of by assuming a difference between God and Self. In, If you are unable to do even this (11) since it has been hinted that it (Karma-yoga) is an effect of ignorance, therefore the Lord is pointing out that Karma-yoga is not suitable for the meditator on the Immutable, who is aware of idenity (of the Self with God). The Lord is similarly pointing out the impossibility of a karma-yogins meditation on the Immutable. In (the verse), they৷৷.attain Me alone (4), having declared that those who meditate on the Immutable are independent so far as the attainment of Liberation is concerned, the Lord has shown in, ৷৷.I become the Deliverer (7), that others have no independence; they are dependent on God. For, if they (the former) be considered to have become identified with God, they would be the same as the Immutable on account of (their) having realized non-difference. Conseently, speaking of them as objects of the act of deliverance will become inappropriate! And, since the Lord in surely the greatest well-wisher of Arjuna, He imparts instructions only about Karma-yoga, which involves perception of duality and is not associated with full Illumination. Also, no one who has realized his Self as God through valid means of knowledge would like subordination to another, since it involves a contradiction. Therefore, with the idea, I shall speak of the group of virtues (as stated in), He hwo is not hateful towards any creature, etc. which are the direct means to Immortality, to those monks who meditate on the Immutable,who are steadfast in full enlightenment and have given up all desires, the Lord proceeds:

English Translation of Commentary - Dr. S. Sankaranarayan

12.12 Sreyah etc. Knowledge in the form of entering into [the Lord] is superior to practice; for practice bears that result. Due to the entering into the Lord, the meditation i.e., getting absorbed in the Bhagavat, becomes pre-eminent i.e., attains superiority, because of the achievement of what is desired. When meditation i.e., getting absorbed in the Bhagavat is accomplished, then it is possible to renounce fruits of actions. Otherwise how can there be a renunciation in what is unknown ? When renunciation of fruits of actions is achieved, there arises an uninterrupted peace. Therefore, being the root of all [these], the knowledge aone, in the form of fixing the mind in the Lord is important.

English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary

12.12 More than the practice of remembrance (of the Lord), which is difficult in the absence of love for the Lord, the direct knowledge of the self, arising from the contemplation of the imperishable self (Aksara), is conducive to the well-being of the self. Better than the imperfect knowledge of the self, is perfect meditation on the self, as it is more conducive to the well-being of the self. More conducive than imperfect meditation (i.e., meditation unaccompanied with renunciation), is the activity performed with renunciation of the fruits. It is only after the annihilation of sins, through the performance of works accompanied by renounciation of fruits, that peace of mind is attained. When the mind is at peace, perfect meditation on the self is possible. From meditation results the direct realisation of the self. From the direct realisation of the self results supreme devotion. It is in this way that Atmanistha or devotion to the individual self becomes useful for a person who is incapable of practising loving devotion to the Supreme Being. And for one practising the discipline for attaining the self (Jnana Yoga) without acisition of perfect tranillity of mind, disinterested activity (Karma Yoga), including in it meditation on the self, is the better path for the knowledge of the self. [Thus the steps are performance of works without desire for fruits, eanimity of mind, meditation on the self, self-realisation, and devotion to the Lord.] Now Sri Krsna enumerates the attributes reired of one intent on performance of disinterested activity:

Commentary - Chakravarthi Ji

In this verse, the Lord makes clear the successive superiority of abhyasa, manana and smarana spoken of previously. Better than practice is fixing the intelligence in me (jnanam or mananam). By performing practice alone it is difficult to achieve meditation. By performing manana, easily one can come to meditation. But meditation (mayi mana adhatsva, or smarana) is better than jnana or manana. Why? From meditation one becomes devoid of desire for fruits of sakama karma in the form of svarga, and the fruits of niskama karma in the form of liberation. Even though these are attained without his endeavor, the devotee is indifferent to them. Before the devotee reaches steady meditation, when he has not yet attained rati (bhava), he has just a desire to give up liberation. But one who is fixed in meditation (at bhava stage) is repelled by moksa. He takes liberation as insignificant. That meditation is the cause for indifference to moksa. This is stated in Bhakti Rasamrta Sindhu, where bhakti is glorified with six qualities: klesa-ghni subhada moksa-laghutakrt sudurlabha sandrananda-visesatma sri-krsnakarsani ca sa Bhakti is characterized by destruction of suffering, bestowal of good qualities, disregard for liberation, rarity, intense spiritual bliss and attracting even Krishna. Bhakti Rasamrta Sindhu 1.1.17 na paramesthyam na mahendra-dhisnyam na sarvabhaumam na rasadhipatyam na yoga-siddhir apunar-bhavam va mayy arpitatmecchati mad vinanyat The devotee who has offered his soul to Me does not want anything if it is separate from Me – not the position of the supreme demigod of the universe, Brahma, nor that of Lord Indra, nor kingship over the entire earth or over the lower planetary systems, nor the mystic perfections of yoga, nor even freedom from the cycle of rebirth. SB 11.14.14 In that verse, the phrase mayy arpita atma means “fixed in meditation on me.” After developing distaste for the fruits of action, one then attains peace in the form of stopping the senses from dwelling on all objects except my form and qualities. This explanation directly links the succession of stages from the two words sreyah and visisyate in the first line to anantaram in the second line. No other explanation can be considered.

Rudra Vaishnava Sampradaya - Commentary

The renunciation of the rewards of actions is being praised. Knowledge based on Vedic teachings coupled with guidance by guru gives direct realisation of the Supreme Lord Krishna and is superior to even great endeavour without realisation of Him. Meditation based on realisation of Lord Krishna is superior to knowledge of Him. The Mukunda Upanisad III.I.VIII states: Through meditation on the Supreme Lord one realises the absolute. Such a state of meditation naturally leads to lack of desire and renunciation of the rewards of actions which continually practised bestows by Lord Krishnas grace moksa or liberation from samsara or the perpetual cycle of birth and death in the material existence.

Brahma Vaishnava Sampradaya - Commentary

2 Knowledge is superior to performance of an activity without proper knowledge. Still better is meditation with divine knowledge rather than mere knowledge by itself. In the Abhimlan section of the Sama Veda is stated: Better is divine knowledge then mere meditation. Better is the meditation associated with divine knowledge rather then mere knowledge alone because from this comes atma tattva or realization of the soul and the Supreme peace. Along with meditation karma-phala-tyagas or renunciation of the rewards of actions, is also praised and is essential to spiritual success otherwise one would not be qualified. So divine knowledge also associated with renunciation is also recommended. But superior to even renunciation of the rewards of actions is complete equanimity to all actions. So wisdom is the determining factor for the method implemented and is naturally based on qualification and level of development. Renunciation has been expounded upon in previous chapters but now it is being elucidated as an adjunct with meditation. The Gaupavana section states: Superior to meditation without renunciation is meditation with renunciation. It is logical that the importance of renunciation should be deemed worthy of application to meditation for superior to meditation with knowledge is meditation with knowledge exhibiting renunciation of the rewards of meditation for this leads to complete equanimity regarding all actions. Otherwise it could never be possible to achieve peace of mind if one failed to renounce the desire for results and was always hankering for rewards and this is what is being affirmed by Lord Krishna. The Kashayana section states: Superior to meditation with knowledge is non-attachment to performing actions for rewards and the renunciation of the rewards of actions coupled with bhakti or exclusive devotion to the Supreme Lord. Not by renunciation alone is moksa or liberation from material existence possible neither is it possible by meditation with renunciation. It only manifests when they both are in association with bhakti to the Supreme Lord Krishna through the medium of the spiritual master from one of the four authorised sampradayas or empowered channels of disciplic succession as revealed in Vedic scriptures. Otherwise it would be like praising renunciation and meditation by themselves and that is not correct for the reality is that only by bhakti is success guaranteed. An example is that in battle soldiers fight for the kingdom and win the war but the success is deemed attributed to the efforts of the king alone, bhakti is like this. Now begins the summation. One who exclusively propitiates the Supreme Lord Krishna considering all other gods as merely aspects of His potencies and thus subservient to Him are known as undeviated and undistracted. Lord Krishna has already confirmed that the rewards solicited from all other gods are only temporary and not eternal because they themselves are not on the eternal platform. Here a query might arise regarding the worship of Sri Laxsmi because she is so inseparable from the Supreme Lord and now this doubt will be specially clarified. When one offers bhakti or exclusive loving devotion to the Supreme Lord by japa or chanting His holy names or by prayers, or by worship or by singing and praising His glories etc. Then it should be understood that these activities are initiated from within by Sri Laxsmi for the satisfaction of the Supreme Lord. When one firsts worships other gods and then worships the Supreme Lord it should be understood that there is an acute lack of bhakti and while pleasing to other gods is not acceptable by Sri Laxsmi for it was not performed for the satisfaction of the Supreme Lord even if one offers the Supreme Lord the complete rewards received for worshipping the demigods. The activity may be big or small but the Supreme Lord only accepts it if the intention is 100% for His exclusive satisfaction alone. So in conclusion all ones activities should be intended as an offering to the Supreme Lord because from such activities realization dawns and renunciation of the rewards of action arises and liberation from material existence manifests and the Supreme peace is attained.

Shri Vaishnava Sampradaya - Commentary

4 5 If the performance of activities for the Supreme Lord is merely an exercise ordered by the mind for the body to enact then in no way can it be considered bhakti or exclusive loving devotion as it being merely a dictate of the mind has no connection to the heart and without passing through the heart there is no possibility of accessing the consciousness of the atma or eternal soul. The mind however great it may be has no qualification or eligibility to access the atma. Thus it would behove an aspirant to pursue the next alternative and attempt to develop atma tattva or soul realisation as instructed by Lord Krishna in verses III. IV and V of this chapter. If after prolonged practice and attempts if atna tattva does not arise because of a lack of inner spiritual development or due to an unstable mind easily distracted or because of weakness in controlling the senses then one should adopt themselves to the contemplation and reflection of the atma as delineated in chapter two as the next alternative. If even this is to difficult to execute with regularity then one should perform activities that please the Supreme Lord and renounce the desire for rewards for it. Such activities are associating with His devotees and rendering service to them, celebrating the appearance days of Him and His avatars or incarnations and fasting from all grains on ekadasi which is the 11th day of the waxing and waning moon. Performing activities in this way without any interest in receiving rewards and benefits will result in the absence of all reactions and thus the cessation of all sins. Thereafter one will achieve peace of mind and from there one becomes a candidate for practising contemplation of the atma. In conclusion aspirants who are inept at performing bhakti are encouraged to perform simpler methods which will step by step gradually bring one up to that platform. Thus alternative methods applicable for the inept who wish to evolve themselves have been succinctly enumerated.

Kumara Vaishnava Sampradaya - Commentary

4 5 If the performance of activities for the Supreme Lord is merely an exercise ordered by the mind for the body to enact then in no way can it be considered bhakti or exclusive loving devotion as it being merely a dictate of the mind has no connection to the heart and without passing through the heart there is no possibility of accessing the consciousness of the atma or eternal soul. The mind however great it may be has no qualification or eligibility to access the atma. Thus it would behove an aspirant to pursue the next alternative and attempt to develop atma tattva or soul realisation as instructed by Lord Krishna in verses III. IV and V of this chapter. If after prolonged practice and attempts if atna tattva does not arise because of a lack of inner spiritual development or due to an unstable mind easily distracted or because of weakness in controlling the senses then one should adopt themselves to the contemplation and reflection of the atma as delineated in chapter two as the next alternative. If even this is to difficult to execute with regularity then one should perform activities that please the Supreme Lord and renounce the desire for rewards for it. Such activities are associating with His devotees and rendering service to them, celebrating the appearance days of Him and His avatars or incarnations and fasting from all grains on ekadasi which is the 11th day of the waxing and waning moon. Performing activities in this way without any interest in receiving rewards and benefits will result in the absence of all reactions and thus the cessation of all sins. Thereafter one will achieve peace of mind and from there one becomes a candidate for practising contemplation of the atma. In conclusion aspirants who are inept at performing bhakti are encouraged to perform simpler methods which will step by step gradually bring one up to that platform. Thus alternative methods applicable for the inept who wish to evolve themselves have been succinctly enumerated.

Transliteration Bhagavad Gita 12.12

Shreyo hi jnaanamabhyaasaat jnaanaaddhyaanam vishishyate; Dhyaanaat karmaphalatyaagas tyaagaacchaantir anantaram.

Word Meanings Bhagavad Gita 12.12

śhreyaḥ—better; hi—for; jñānam—knowledge; abhyāsāt—than (mechanical) practice; jñānāt—than knowledge; dhyānam—meditation; viśhiṣhyate—better; dhyānāt—than meditation; karma-phala-tyāgaḥ—renunciation of the fruits of actions; tyāgāt—renunciation; śhāntiḥ—peace; anantaram—immediately