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Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 6

भगवद् गीता अध्याय 7 श्लोक 6

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा।।7.6।।

हिंदी अनुवाद - स्वामी रामसुख दास जी ( भगवद् गीता 7.6)

।।7.6।।अपरा और परा इन दोनों प्रकृतियोंके संयोगसे ही सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं ऐसा तुम समझो। मैं सम्पूर्ण जगत्का प्रभव तथा प्रलय हूँ।

हिंदी अनुवाद - स्वामी तेजोमयानंद

।।7.6।। यह जानो कि समम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियों से उत्पत्ति वाले हैं। (अत) मैं सम्पूर्ण जगत् का उत्पत्ति तथा प्रलय स्थान हूँ।।

हिंदी टीका - स्वामी रामसुख दास जी

।।7.6।। व्याख्या  एतद्योनीनि भूतानि (टिप्पणी प0 401.1) जितने भी देवता मनुष्य पशु पक्षी आदि जङ्गम और वृक्ष लता घास आदि स्थावर प्राणी हैं वे सबकेसब मेरी अपरा और परा प्रकृतिके सम्बन्धसे ही उत्पन्न होते हैं।तेरहवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके सम्बन्धसे सम्पूर्ण स्थावरजङ्गम प्राणियोंकी उत्पत्ति बतायी है। यही बात सामान्य रीतिसे चौदहवें अध्यायके चौथे श्लोकमें भी बतायी है कि स्थावर जङ्गम योनियोंमें उत्पन्न होनेवाले जितने शरीर हैं वे सब प्रकृतिके हैं और उन शरीरोंमें जो बीज अर्थात् जीवात्मा है वह मेरा अंश है। उसी बीज अर्थात् जीवात्माको भगवान्ने परा प्रकृति (7। 5) और अपना अंश (15। 7) कहा है।सर्वाणीत्युपधारय स्वर्गलोक मृत्युलोक पाताललोक आदि सम्पूर्ण लोकोंके जितने भी स्थावरजङ्गम प्राणी हैं वे सबकेसब अपरा और परा प्रकृतिके संयोगसे ही उत्पन्न होते हैं। तात्पर्य है कि परा प्रकृतिने अपराको अपना मान लिया है (टिप्पणी प0 401.2) उसका सङ्ग कर लिया है इसीसे सब प्राणी पैदा होते हैं इसको तुम धारण करो अर्थात् ठीक तरहसे समझ लो अथवा मान लो।अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा मात्र वस्तुओंको सत्तास्फूर्ति परमात्मासे ही मिलती है इसलिये भगवान् कहते हैं कि मैं सम्पूर्ण जगत्का प्रभव (उत्पन्न करनेवाला) और प्रलय (लीन करनेवाला) हूँ।प्रभवःका तात्पर्य है कि मैं ही इस जगत्का निमित्तकारण हूँ क्योंकि सम्पूर्ण सृष्टि मेरे संकल्पसे (टिप्पणी प0 401.3) पैदा हुई है सदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति (छान्दोग्य0 6। 2। 3)।जैसे घड़ा बनानेमें कुम्हार और सोनेके आभूषण बनानेमें सुनार ही निमित्तकारण है ऐसे ही संसारमात्रकी उत्पत्तिमें भगवान् ही निमित्तकारण हैं।प्रलयः कहनेका तात्पर्य है कि इस जगत्का उपादानकारण भी मैं ही हूँ क्योंकि कार्यमात्र उपादानकारणसे उत्पन्न होता है उपादानकारणरूपसे ही रहता है और अन्तमें उपादानकारणमें ही लीन हो जाता है।जैसे घड़ा बनानेमें मिट्टी उपादानकारण है ऐसे ही सृष्टिकी रचना करनेमें भगवान् ही उपादानकारण हैं। जैसे घड़ा मिट्टीसे ही पैदा होता है मिट्टीरूप ही रहता है और अन्तमें टूट करके घिसतेघिसते मिट्टी ही बन जाता है और जैसे सोनेके यावन्मात्र आभूषण सोनेसे ही उत्पन्न होते हैं सोनारूप ही रहते हैं और अन्तमें सोना ही रह जाते हैं ऐसे ही यह संसार भगवान्से ही उत्पन्न होता है भगवान्में ही रहता है और अन्तमें भगवान्में ही लीन हो जाता है। ऐसा जानना ही ज्ञान है। सब कुछ भगवत्स्वरूप है भगवान्के सिवाय दूसरा कुछ है ही नहीं ऐसा अनुभव हो जाना विज्ञान है।कृत्स्नस्य जगतः पदोंमें भगवान्ने अपनेको जडचेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्का प्रभव और प्रलय बताया है। इसमें जड(अपरा प्रकृति) का प्रभव और प्रलय बताना तो ठीक है पर चेतन(परा प्रकृति अर्थात् जीवात्मा) का उत्पत्ति और विनाश कैसे हुआ क्योंकि वह तो नित्य तत्त्व है नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः (गीता 2। 24)। जो परिवर्तनशील है उसको जगत् कहते हैं गच्छतीति जगत्। पर यहाँ जगत् शब्द जडचेतनात्मक सम्पूर्ण संसारका वाचक है। इसमें जडअंश तो परिवर्तनशील है और चेतनअंश सदासर्वथा परिवर्तनरहित तथा निर्विकार है। वह निर्विकार तत्त्व जब जडके साथ अपना सम्बन्ध मानकर तादात्म्य कर लेता है तब वह जड(शरीर) के उत्पत्तिविनाशकको अपना उत्पत्तिविनाश मान लेता है। इसीसे उसके जन्ममरण कहे जाते हैं। इसीलिये भगवान्ने अपनेको सम्पूर्ण जगत् अर्थात् अपरा और परा प्रकृतिका भाव तथा प्रलय बताया है।अगर यहाँ जगत् शब्दसे केवल नाशवान् परिवर्तनशील और विकारी संसारको ही लिया जाय चेतनको नहीं लिया जाय तो बड़ी बाधा लगेगी। भगवान्ने कृत्स्नस्य जगतः पदोंसे अपनेको सम्पूर्ण जगत्का कारण बताया है (टिप्पणी प0 402)। अतः सम्पूर्ण जगत्के अन्तर्गत स्थावरजङ्गम जडचेतन सभी लिये जायँगे। अगर केवल जडको लिया जायगा तो चेतनभाग छूट जायगा जिससे मैं सम्पूर्ण जगत्का कारण हूँ यह कहना नहीं बन सकेगा और आगे भी बड़ी बाधा लगेगी। कारण कि आगे इसी अध्यायके तेरहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि तीनों गुणोंसे मोहित जगत् मेरेको नहीं जानता तो यहाँ जानना अथवा न जानना चेतनका ही हो सकता है जडका जानना अथवा न जानना होता ही नहीं। इसलिये जगत् शब्दसे केवल जडको ही नहीं चेतनको भी लेना पड़ेगा।ऐसे ही सोलहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें भी आसुरी सम्पदावालोंकी मान्यताके अनुसार जगत् शब्दसे जड और चेतन दोनों ही लेने पड़ेंगें क्योंकि आसुरी सम्पदावाले व्यक्ति सम्पूर्ण शरीरधारी जीवोंको असत्य मानते हैं केवल जडको नहीं। इसलिये अगर वहाँ जगत् शब्दसे केवल जड संसार ही लिया जाय तो जगत्को (जड संसारको) असत्य मिथ्या और अप्रतिष्ठित कहनेवाले अद्वैतसिद्धान्ती भी आसुरी सम्पदावालोंमें आ जायँगे जो कि सर्वथा अनुचित है। ऐसे ही आठवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें आये शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः पदोंमें जगत् शब्द केवल जडका ही वाचक मानें तो जडकी शुक्ल और कृष्ण गतिका क्या तात्पर्य होगा गति तो चेतनकी ही होती है। जडसे तादात्म्य करनेके कारण ही चेतनको जगत् नामसे कहा गया है।इन सब बातोंपर विचार करनेसे यह निष्कर्ष निकलता है कि जडके साथ एकात्मता करनेसे जीव जगत् कहा जाता है। परन्तु जब यह जडसे विमुख होकर चिन्मयतत्त्वके साथ अपनी एकताका अनुभव कर लेता है तब यह योगी कहा जाता है जिसका वर्णन गीतामें जगहजगह आया है। सम्बन्ध  पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अपनेको परा और अपरा प्रकृतिरूप सम्पूर्ण जगत्का मूल कारण बताया। अब भगवान्के सिवाय भी जगत्का और कोई कारण होगा इसका आगेके श्लोकमें निषेध करते हैं।

हिंदी टीका - स्वामी चिन्मयानंद जी

।।7.6।। उपर्युक्त अपरा एवं परा प्रकृतियों के परस्पर संबंध से यह नानाविध वैचित्र्यपूर्ण सृष्टि व्यक्त होती है। जड़ प्रकृति के बिना चैतन्य की सार्मथ्य व्यक्त नहीं हो सकती और न ही उसके बिना जड़ उपाधियों में चेनवत् व्यवहार की संभावना ही रहती है। बल्ब में स्थित तार में स्वयं विद्युत् ही प्रकाश के रूप मे व्यक्त होती है। प्रकाश की अभिव्यक्ति के लिए विद्युत् और बल्ब दोनों का संबंध होना आवश्यक है। इसी प्रकार सृष्टि के लिए परा और अपरा जड़ और चेतन के संबंध की अपेक्षा होती है।इसी दृष्टि से भगवान् कहते हैं ये दोनों प्रकृतियां भूतमात्र की कारण हैं। एक मेधावी विद्यार्थी को इस कथन का अभिप्राय समझना कठिन नहीं है। बाह्य विषय भावनाएं तथा विचारों के जगत् की न केवल उत्पत्ति और स्थिति बल्कि लय भी चेतन पुरुष में ही होता है। इस प्रकार अपरा प्रकृति पारमार्थिक स्वरूप में पराप्रकृति से भिन्न नहीं है। आत्मा मानो अपने स्वरूप को भूलकर अपरा प्रकृति के साथ तादात्म्य करके जीवभाव के दुखों को प्राप्त होता है। परन्तु उसका यह दुख मिथ्या है वास्तविक नहीं। स्वस्वरूप की पहचान ही अनात्मबन्धन से मुक्ति का एकमात्र उपाय है। परा से अपरा की उत्पत्ति उसी प्रकार होती है जैसे मिट्टी के बने घटों की मिट्टी से। स्ाभी घटों में एक मिट्टी ही सत्य है उसी प्रकार विषय इन्द्रियां मन तथा बुद्धि इन अपरा प्रकृति के कार्यों का वास्तविक स्वरूप चेतन तत्त्व ही है।इसलिये