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Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 25

भगवद् गीता अध्याय 7 श्लोक 25

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्।।7.25।।

हिंदी अनुवाद - स्वामी रामसुख दास जी ( भगवद् गीता 7.25)

।।7.25।।जो मूढ़ मनुष्य मेरेको अज और अविनाशी ठीक तरहसे नहीं जानते (मानते) उन सबके सामने योगमायासे अच्छी तरहसे आवृत हुआ मैं प्रकट नहीं होता।

हिंदी टीका - स्वामी रामसुख दास जी

।।7.25।। व्याख्या  मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् मैं अज और अविनाशी हूँ अर्थात् जन्ममरणसे रहित हूँ। ऐसा होनेपर भी मैं प्रकट और अन्तर्धान होनेकी लीला करता हूँ अर्थात् जब मैं अवतार लेता हूँ तब अज (अजन्मा) रहता हुआ ही अवतार लेता हूँ और अव्ययात्मा रहता हुआ ही अन्तर्धान हो जाता हूँ। जैसे सूर्य भगवान् उदय होते हैं तो हमारे सामने आ जाते हैं और अस्त होते हैं तो हमारे नेत्रोंसे ओझल हो जाते हैं छिप जाते हैं ऐसे ही मैं केवल प्रकट और अन्तर्धान होनेकी लीला करता हूँ। जो मेरेको इस प्रकार जन्ममरणसे रहित मानते हैं वे तो असम्मूढ़ हैं (गीता 10। 3 15। 19)। परन्तु जो मेरेको साधारण प्राणियोंकी तरह जन्मनेमरनेवाला मानते हैं वे मूढ़ हैं (गीता 9। 11)।भगवान्को अज अविनाशी न माननेमें कारण है कि इस मनुष्यका भगवान्के साथ जो स्वतः अपनापन है उसको भूलकर इसने शरीरको अपना मान लिया कि यह शरीर ही मैं हूँ और यह शरीर मेरा है। इसलिये उसके सामने परदा आ गया जिससे वह भगवान्को भी अपने समान ही जन्मनेमरनेवाला मानने लगा।मूढ़ मनुष्य मेरेको अज और अविनाशी नहीं जानते। उनके न जाननेमें दो कारण हैं एक तो मेरा योगमायासे छिपा रहना और एक उनकी मूढ़ता। जैसे किसी शहरमें किसीका एक घर है और वह अपने घरमें बंद है तथा शहरके सबकेसब घर शहरकी चहारदीवारी (परकोटे) में बंद हैं। अगर वह मनुष्य बाहर निकलना चाहे तो अपने घरसे निकल सकता है पर शहरकी चहारदीवारीसे निकलना उसके हाथकी बात नहीं है। हाँ यदि उस शहरका राजा चाहे तो वह चहारदीवारीका दरवाजा भी खोल सकता है और उसके घरका दरवाजा भी खोल सकता है। अगर वह मनुष्य अपने घरका दरवाजा नहीं खोल सकता तो राजा उस दरवाजेको तोड़ भी सकता है। ऐसे ही यह प्राणी अपनी मूढ़ताको दूर करके अपने नित्य स्वरूपको जान सकता है। परन्तु सर्वथा भगवत्तत्त्वका बोध तो भगवान्की कृपासे ही हो सकता है। भगवान् जिसको जनाना चाहें वही उनको जान सकता है सोइ जानइ जेहि देहु जनाई (मानस 2। 127। 2)। अगर मनुष्य सर्वथा भगवान्के शरण हो जाय तो भगवान् उसके अज्ञानको भी दूर कर देते हैं और अपनी मायाको भी दूर कर देते हैं।नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः उन सबके सामने अर्थात् उस मूढ़ समुदायके सामने मैं भगवद्रूपसे प्रकट नहीं होता। कारण कि वे मेरेको अजअविनाशी भगवद्रूपसे जानना अथवा मानना ही नहीं चाहते प्रत्युत वे मेरेको साधारण मनुष्य मानकर मेरी अवहेलना करते हैं। अतः उनके सामने मैं अपने भगवत्स्वरूपसे कैसे प्रकट होऊँ तात्पर्य है कि जो मेरेको अजअविनाशी नहीं मानते प्रत्युत मेरेको जन्मनेमरनेवाला मानते हैं उनके सामने मैं अपनी योगमायामें छिपा रहता हूँ और सामान्य मनुष्यजैसा ही रहता हूँ। परन्तु जो मेरेको अज अविनाशी और सम्पूर्ण प्राणियोंका ईश्वर मानते हैं मेरेमें श्रद्धाविश्वास रखते हैं उनके भावोंके अनुसार मैं उनके सामने प्रकट रहता हूँ।भगवान्की योगमाया विचित्र विलक्षण अलौकिक है। मनुष्योंका भगवान्के प्रति जैसा भाव होता है उसके अनुसार ही वे योगमायासमावृत भगवान्को देखते हैं (टिप्पणी प0 435)।यहाँ भगवान्ने कहा है कि जो मेरेको अजअविनाशी नहीं जानते वे मूढ़ हैं और दसवें अध्यायके दूसरे श्लोकमें कहा है कि देवता और महर्षि मेरे प्रभवको नहीं जानते। इसपर शङ्का होती है कि भगवान्को अजअविनाशी नहीं जानना और उनके प्रभवको नहीं जानना ये दोनों बातें तो एक ही हो गयीं परन्तु यहाँ न जाननेवालोंको मूढ़ बताया है और वहाँ उनको मूढ़ बताया है ऐसा क्यों इसका समाधान है कि भगवान्के प्रभवको अर्थात् प्रकट होनेको न जानना दोषी नहीं है क्योंकि वहाँ भगवान्ने स्वयं कहा है कि मैं सब तरहसे देवताओं और महर्षियोंका आदि हूँ। जैसे बालक अपने पिताके जन्मको कैसे देख सकता है क्योंकि वह उस समय पैदा ही नहीं हुआ था। वह तो पितासे पैदा हुआ है। अतः उसका पिताके जन्मको न जानना दोषी नहीं है। ऐसे ही भगवान्के प्रकट होनेके हेतुओँको पूरा न जानना देवताओँ और महर्षियोंके लिये कोई दोषी नहीं है। भगवान्के प्रकट होनेको कोई सर्वथा जान ही नहीं सकता। इसलिये वहाँ देवताओं और महर्षियोंको मूढ़ नहीं बताया है। मनुष्य भगवान्को अजअविनाशी जान सकते हैं अर्थात् मान सकते हैं। अगर वे भगवान्को अजअविनाशी नहीं मानते तो यह उनका दोष है। इसलिये उनको यहाँ मूढ़ कहा है। सम्बन्ध  जो भगवान्को अजअविनाशी नहीं मानते उनके ही सामने मायाका परदा रहता है पर भगवान्के सामने वह परदा नहीं रहता इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।