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Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 39

भगवद् गीता अध्याय 6 श्लोक 39

एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते।।6.39।।

हिंदी अनुवाद - स्वामी रामसुख दास जी ( भगवद् गीता 6.39)

।।6.39।।हे कृष्ण मेरे इस सन्देहका सर्वथा छेदन करनेके लिये आप ही योग्य हैं क्योंकि इस संशयका छेदन करनेवाला आपके सिवाय दूसरा कोई हो नहीं सकता।

हिंदी टीका - स्वामी रामसुख दास जी

।।6.39।। व्याख्या  एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य होनेसे साधक पापकर्मोंसे तो सर्वथा रहित हो गया इसलिये वह नरकोंमें तो जा ही नहीं सकता और स्वर्गका ध्येय न रहनेसे स्वर्गमें भी जा नहीं सकता। मनुष्ययोनिमें आनेका उसका उद्देश्य नहीं है इसलिये वह उसमें भी नहीं आ सकता और परमात्मप्राप्तिके साधनसे भी विचलित हो गया। ऐसा साधक क्या छिन्नभिन्न बादलकी तरह नष्ट तो नहीं हो जाता यह मेरा संशय है।त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते इस संशयका सर्वथा छेदन करनेवाला अन्य कोई हो नहीं सकता। इसका तात्पर्य है कि शास्त्रकी कोई गुत्थी हो शास्त्रका कोई गहन विषय हो कोई ऐसा कठिन पंक्ति हो जिसका अर्थ न लगता हो तो उसको शास्त्रोंका ज्ञाता कोई विद्वान् भी समझा सकता है। परन्तु योगभ्रष्टकी क्या गति होती है इसका उत्तर वह नहीं दे सकता। हाँ योगी कुछ हदतक इसको जान सकता है पर वह सम्पूर्ण प्राणियोंकी गतिआगतिको अर्थात् जाने और आनेको नहीं जान सकता क्योंकि वह युञ्जान योगी है अर्थात् अभ्यास करके योगी बना है। अतः वह वहींतक जान सकता है जहाँतक उसकी जाननेकी हद है। परन्तु आप तो युक्त योगी हैं अर्थात् आप बिना अभ्यास परिश्रमके सर्वत्र सब कुछ जाननेवाले हैं। आपके समान जानकार कोई हो सकता ही नहीं। आप साक्षात् भगवान् हैं और सम्पूर्ण प्राणियोंकी गतिआगतिको जाननेवाले हैं (टिप्पणी प0 375)। अतः इस योगभ्रष्टके गतिविषयक प्रश्नका उत्तर आप ही दे सकते हैं। आप ही मेरे इस संशयको दूर कर सकते हैं। सम्बन्ध  अड़तीसवें श्लोकमें अर्जुनने शङ्का की थी कि संसारसे और साधनसे च्युत हुए साधकका कहीं पतन तो नहीं हो जाता उसका समाधान करनेके लिये भगवान् आगेका श्लोक कहते हैं।