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Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 14

भगवद् गीता अध्याय 6 श्लोक 14

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः।।6.14।।

हिंदी अनुवाद - स्वामी रामसुख दास जी ( भगवद् गीता 6.14)

।।6.14।।जिसका अन्तःकरण शान्त है जो भयरहित है और जो ब्रह्मचारिव्रतमें स्थित है ऐसा सावधान योगी मनका संयम करके मेरेमें चित्त लगाता हुआ मेरे परायण होकर बैठे।

हिंदी टीका - स्वामी रामसुख दास जी

।।6.14।। व्याख्या प्रशान्तात्मा   जिसका अन्तःकरण रागद्वेषसे रहित है वह प्रशान्तात्मा है। जिसका सांसारिक विशेषता प्राप्त करनेका ऋद्धिसिद्धि आदि प्राप्त करनेका उद्देश्य न होकर केवल परमात्मप्राप्तिका ही दृढ़ उद्देश्य होता है उसके रागद्वेष शिथिल होकर मिट जाते हैं। रागद्वेष मिटनेपर स्वतः शान्ति आ जाती है जो कि स्वतःसिद्ध है। तात्पर्य है कि संसारके सम्बन्धके कारण ही हर्ष शोक रागद्वेष आदि द्वन्द्व होते हैं और इन्हीं द्वन्द्वोंके कारण शान्ति भङ्ग होती है। जब ये द्वन्द्व मिट जाते हैं तब स्वतःसिद्ध शान्ति प्रकट हो जाती है। उस स्वतःसिद्ध शान्तिको प्राप्त करनेवालेका नाम ही प्रशान्तात्मा है।विगतभीः शरीरको मैं और मेरा माननेसे ही रोगका निन्दाका अपमानका मरने आदिका भय पैदा होता है। परन्तु जब मनुष्य शरीरके साथ मैं और मेरेपनकी मान्यताको छोड़ देता है तब उसमें किसी भी प्रकारका भय नहीं रहता। कारण कि उसके अन्तःकरणमें यह भाव दृढ़ हो जाता है कि इस शरीरको जीना हो तो जीयेगा ही इसको कोई मार नहीं सकता और इस शरीरको मरना हो तो मरेगा ही फिर इसकोकोई बचा नहीं सकता। यदि यह मर भी जायगा तो बड़े आनन्दकी बात है क्योंकि मेरी चित्तवृत्ति परमात्माकी तरफ होनेसे मेरा कल्याण तो हो ही जायगा जब कल्याणमें कोई सन्देह ही नहीं तो फिर भय किस बातका इस भावसे वह सर्वथा भयरहित हो जाता है।ब्रह्मचारिव्रते स्थितः यहाँ ब्रह्मचारिव्रत का तात्पर्य केवल वीर्यरक्षासे ही नहीं है प्रत्युत ब्रह्मचारीके व्रतसे है। तात्पर्य है कि जैसे ब्रह्मचारीका जीवन गुरुकी आज्ञाके अनुसार संयत और नियत होता है ऐसे ही ध्यानयोगीको अपना जीवन संयत और नियत रखना चाहिये। जैसे ब्रह्मचारी शब्द स्पर्श रूप रस और गन्ध इन पाँच विषयोंसे तथा मान बड़ाई और शरीरके आरामसे दूर रहता है ऐसे ही ध्यानयोगीको भी उपर्युक्त आठ विषयोंमेंसे किसी भी विषयका भोगबुद्धिसे रसबुद्धिसे सेवन नहीं करना चाहिये प्रत्युत निर्वाहबुद्धिसे ही सेवन करना चाहिये। यदि भोगबुद्धिसे उन विषयोंका सेवन किया जायगा तो ध्यानयोगकी सिद्धि नहीं होगी। इसलिये ध्यानयोगीको ब्रह्मचारिव्रतमें स्थित रहना बहुत आवश्यक है।व्रतमें स्थित रहनेका तात्पर्य है कि किसी भी अवस्था परिस्थिति आदिमें किसी भी कारणसे कभी किञ्चिन्मात्र भी सुखबुद्धिसे पदार्थोंका सेवन न हो चाहे वह ध्यानकाल हो चाहे व्यवहारकाल हो। इसमें सम्पूर्ण इन्द्रियोंका ब्रह्मचर्य आ जाता है।मनः संयम्य मच्चित्तः मनको संयत करके मेरेमें ही लगा दे अर्थात् चित्तको संसारकी तरफसे सर्वथा हटाकर केवल मेरे स्वरूपके चिन्तनमें मेरी लीला गुण प्रभाव महिमा आदिके चिन्तनमें ही लगा दे। तात्पर्य है कि सांसारिक वस्तु व्यक्ति परिस्थिति घटना आदिको लेकर मनमें जो कुछ संकल्पविकल्परूपसे चिन्तन होता है उससे मनको हटाकर एक मेरेमें ही लगाता रहे।मनमें जो कुछ चिन्तन होता है वह प्रायः भूतकालका होता है और कुछ भविष्यकालका भी होता है तथा वर्तमानमें साधक मन परमात्मामें लगाना चाहता है। जब भूतकालकी बात याद आ जाय तब यह समझे कि वह घटना अभी नहीं है और भविष्यकी बात याद आ जाय तो वह भी अभी नहीं है। वस्तु व्यक्ति पदार्थ घटना परिस्थिति आदिको लेकर जितने संकल्पविकल्प हो रहे हैं वे उन्हीं वस्तु व्यक्ति आदिके हो रहे हैं जो अभी नहीं हैं। हमारा लक्ष्य परमात्माके चिन्तनका है संसारके चिन्तनका नहीं। अतः जिस संसारका चिन्तन हो रहा है वह संसार पहले नहीं था पीछे नहीं रहेगा और अभी भी नहीं है। परन्तु जिन परमात्माका चिन्तन करना है वे परमात्मा पहले भी थे अब भी हैं और आगे भी रहेंगे। इस तरह सांसारिक वस्तु आदिके चिन्तनसे मनको हटाकर परमात्मामें लगा देना चाहिये। कारण कि भूतकालका कितना ही चिन्तन किया जाय उससे लाभ तो कुछ होगा नहीं और भविष्यका चिन्तन किया जाय तो वह काम अभी कर सकेंगे नहीं तथा भूतभविष्यका चिन्तन होता रहनेसे जो अभी ध्यान करते हैं वह भी होगा नहीं तो सब ओरसे रीते ही रह जायँगे।युक्तः ध्यान करते समय सावधान रहे अर्थात् मनको संसारसे हटाकर भगवान्में लगानेके लिये सदा सावधान जाग्रत् रहे। इसमें कभी प्रमाद आलस्य आदि न करे। तात्पर्य है कि एकान्तमें अथवा व्यवहारमें भगवान्में मन लगानेकी सावधानी सदा बनी रहनी चाहिये क्योंकि चलतेफिरते कामधन्धा करते समय भी सावधानी रहनेसे एकान्तमें मन अच्छा लगेगा और एकान्तमें मन अच्छा लगनेसे व्यवहार करते समय भी मन लगानेमें सुविधा होगी। अतः ये दोनों एकदूसरेके सहायक हैं अर्थात् व्यवहारकी सावधानी एकान्तमें और एकान्तकी सावधानी व्यवहारमें सहायक है।आसीत मत्परः केवल भगवत्परायण होकर बैठे अर्थात् उद्देश्य लक्ष्य ध्येय केवल भगवान्का ही रहे। भगवान्के सिवाय कोई भी सांसारिक वासना आसक्ति कामना स्पृहा ममता आदि न रहे।इसी अध्यायके दसवें श्लोकमें योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः पदोंसे ध्यानयोगका जो उपक्रम किया था उसीको यहाँ युक्त आसीत मत्परः पदोंसे कहा गया है।