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Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 40

भगवद् गीता अध्याय 4 श्लोक 40

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।।4.40।।

हिंदी अनुवाद - स्वामी रामसुख दास जी ( भगवद् गीता 4.40)

।।4.40।।विवेकहीन और श्रद्धारहित संशयात्मा मनुष्यका पतन हो जाता है। ऐसे संशयात्मा मनुष्यके लिये न यह लोक है न परलोक है और न सुख ही है।

हिंदी टीका - स्वामी रामसुख दास जी

 4.40।। व्याख्या   अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति जिस पुरुषका विवेक अभी जाग्रत् नहीं हुआ है तथा जितना विवेक जाग्रत् हुआ है उसको महत्त्व नहीं देता और साथ ही जो अश्रद्धालु है ऐसे संशययुक्त पुरुषका पारमार्थिक मार्गसे पतन हो जाता है। कारण कि संशययुक्त पुरुषकी अपनी बुद्धि तो प्राकृत शिक्षारहित है और दूसरेकी बातका आदर नहीं करता फिर ऐसे पुरुषके संशय कैसे नष्ट हो सकते हैं और संशय नष्ट हुए बिना उसकी उन्नति भी कैसे हो सकती हैअलगअलग बातोंको सुननेसे यह ठीक है अथवा वह ठीक है इस प्रकार सन्देहयुक्त पुरुषका नाम संशयात्मा है। पारमार्थिक मार्गपर चलनेवाले साधकमें संशय पैदा होना स्वाभाविक है क्योंकि वह किसी भी विषयको पढ़ेगा तो कुछ समझेगा और कुछ नहीं समझेगा। जिस विषयको कुछ नहीं समझते उस विषयमें संशय पैदा नहीं होता और जिस विषयको पूरा समझते हैं उस विषयमें संशय नहीं रहता। अतः संशय सदा अधूरे ज्ञानमें ही पैदा होता है इसीको अज्ञान कहते हैं (टिप्पणी प0 272.1)। इसलिये संशयका उत्पन्न होना हानिकारक नहीं है प्रत्युत संशयको बनाये रखना और उसे दूर करनेकी चेष्टा न करना ही हानिकारक है। संशयको दूर करनेकी चेष्टा न करनेपर वह संशय ही सिद्धान्त बन जाता है। कारण कि संशय दूर न होनेपर मनुष्य सोचता है कि पारमार्थिक मार्गमें सब कुछ ढकोसला है और ऐसा सोचकर उसे छोड़ देता है तथा नास्तिक बन जाता है। परिणामस्वरूप उसका पतन हो जाता है। इसलिये अपने भीतर संशयका रहना साधकको बुरा लगना चाहिये। संशय बुरा लगनेपर जिज्ञासा जाग्रत् होती है जिसकी पूर्ति होनेपर संशयविनाशक ज्ञानकी प्राप्ति होती है।साधकका लक्षण है खोज करना। यदि वह मन और इन्द्रियोंसे देखी बातको ही सत्य मान लेता है तो वहीं रुक जाता है आगे नहीं बढ़ पाता। साधकको निरन्तर आगे ही बढ़ते रहना चाहिये। जैसे रास्तेपर चलते समय मनुष्य यह न देखे कि कितने मील आगे आ गये प्रत्युत यह देखे कि कितने मील अभी बाकी पड़े हैं तब वह ठीक अपने लक्ष्यतक पहुँच जायगा। ऐसे ही साधक यह न देखे कि कितना जान लिया अर्थात् अपने जाने हुएपर सन्तोष न करे प्रत्युत जिस विषयको अच्छी तरह नहीं जानता उसे जाननेकी चेष्टा करता रहे। इसलिये संशयके रहते हुए कभी सन्तोष नहीं होना चाहिये प्रत्युत जिज्ञासा अग्निकी तरह दहकती रहनी चाहिये। ऐसा होनेपर साधकका संशय सन्तमहात्माओंसे अथवा ग्रन्थोंसे किसीनकिसी प्रकारसे दूर हो ही जाता है। संशय दूर करनेवाला कोई न मिले तो भगवत्कृपासे उसका संशय दूर हो जाता है।विशेष बातजीवात्मा परमात्माका अंश है ममैवांशो जीवलोके (गीता 15। 7)। इसलिये जब उसमें अपने अंशी परमात्माको प्राप्त करनेकी भूख जाग्रत् होती है और उसकी पूर्ति न होनेका दुःख होता है तब उस दुःखको भगवान् सह नहीं सकते। अतः उसकी पूर्ति भगवान् स्वतः करते हैं। ऐसे ही जब साधकको अपने भीतर स्थित संशयसे व्याकुलता या दुःख होता है तब वह दुःख भगवान्को असह्य होता है। संशय दूर करनेके लिये भगवान्से प्रार्थना नहीं करनी पड़ती प्रत्युत जिस संशयको लेकर साधकको दुःख हो रहा है उससंशयको दूर करके भगवान् स्वतः उसका वह दुःख मिटा देते हैं। संशयात्मा पुरुषकी एक पुकार होती है जो स्वतः भगवान्तक पहुँच जाती है।संशयके कारण साधककी वास्तविक उन्नति रुक जाती है इसलिये संशय दूर करनेमें ही उसका हित है। भगवान् प्राणिमात्रके सुहृद् हैं सुहृदं सर्वभूतानाम् (गीता 5। 29) इसलिये जिस संशयको लेकर मनुष्य व्याकुल होता है और वह व्याकुलता उसे असह्य हो जाती है तो भगवान् उस संशयको किसी भी रीति उपायसे दूर कर देते हैं। गलती यही होती है कि मनुष्य जितना जान लेता है उसीको पूरा समझकर अभिमान कर लेता है कि मैं ठीक जानता हूँ। यह अभिमान महान् पतन करनेवाला हो जाता है।नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः इस श्लोकमें ऐसे संशयात्मा मनुष्यका वर्णन है जो अज्ञ और अश्रद्धालु है। तात्पर्य यह है कि भीतर संशय रहनेपर भी उस मनुष्यकी न तो अपनी विवेकवती बुद्धि है और न वह दूसरेकी बात ही मानता है। इसलिये उस संशयात्मा मनुष्यका पतन हो जाता है। उसके लिये न यह लोक है न परलोक है और न सुख ही है (टिप्पणी प0 272.2)।संशयात्मा मनुष्यका इस लोकमें व्यवहार बिगड़ जाता है। कारण कि वह प्रत्येक विषयमें संशय करता है जैसे यह आदमी ठीक है या बेठीक है यह भोजन ठीक है या बेठीक है इसमें मेरा हित है या अहित है आदि। उस संशयात्मा मनुष्यको परलोकमें भी कल्याणकी प्राप्ति नहीं होती क्योंकि कल्याणमें निश्चयात्मिका बुद्धिकी आवश्यकता होती है और संशयात्मा मनुष्य दुविधामें रहनेके कारण कोई एक निश्चय नहीं कर सकता जैसे जप करूँ या स्वाध्याय करूँ संसारका काम करूँ या परमात्मप्राप्ति करूँ आदि। भीतर संशय भरे रहनेके कारण उसके मनमें भी सुखशान्ति नहीं रहती। इसलिये विवेकवती बुद्धि और श्रद्धाके द्वारा संशयको अवश्य ही मिटा देना चाहिये।दो अलगअलग बातोंको पढ़नेसुननेसे संशय पैदा होता है। वह संशय या तो विवेकविचारके द्वारा दूर हो सकता है या शास्त्र तथा सन्तमहापुरुषोंकी बातोंको श्रद्धापूर्वक माननेसे। इसलिये संशययुक्त पुरुषमें यदि अज्ञता है तो वह विवेकविचारको बढ़ाये और यदि अश्रद्धा है तो श्रद्धाको बढ़ाये क्योंकि इन दोनोंमेंसे किसी एकको विशेषतासे अपनाये बिना संशय दूर नहीं होता। सम्बन्ध   भगवान्ने तैंतीसवें श्लोकसे ज्ञानयोगका प्रकरण आरम्भ करते हुए ज्ञानप्राप्तिका उपाय तथा ज्ञानकी महिमा बतायी। जो ज्ञान गुरुके पास रहकर उनकी सेवा आदि करनेसे होता है वही ज्ञान कर्मयोगसे सिद्ध हुए मनुष्यको अपनेआप प्राप्त हो जाता है ऐसा बताकर भगवान्ने ज्ञानप्राप्तिके पात्रअपात्रका वर्णन करते हुए प्रकरणका उपसंहार किया।अब प्रश्न होता है कि सिद्ध होनेके लिये कर्मयोगीको क्या करना चाहिये इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।