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Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 9

भगवद् गीता अध्याय 3 श्लोक 9

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर।।3.9।।

हिंदी अनुवाद - स्वामी रामसुख दास जी ( भगवद् गीता 3.9)

।।3.9।।यज्ञ (कर्तव्यपालन) के लिये किये जानेवाले कर्मोंसे अन्यत्र (अपने लिये किये जानेवाले) कर्मोंमें लगा हुआ यह मनुष्यसमुदाय कर्मोंसे बँधता है इसलिये हे कुन्तीनन्दन तू आसक्तिरहित होकर उस यज्ञके लिये ही कर्तव्यकर्म कर।

हिंदी टीका - स्वामी रामसुख दास जी

 3.9।। व्याख्या   यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र गीताके अनुसार कर्तव्यमात्रका नामयज्ञ है। यज्ञ शब्दके अन्तर्गत यज्ञ दान तप होम तीर्थसेवन व्रत वेदाध्ययन आदि समस्त शारीरिक व्यावहारिक और पारमार्थिक क्रियाएँ आ जाती हैं। कर्तव्य मानकर किये जानेवाले व्यापार नौकरी अध्ययन अध्यापन आदि सब शास्त्रविहित कर्मोंका नाम भी यज्ञ है। दूसरोंको सुख पहुँचाने तथा उनका हित करनेके लिये जो भी कर्म किये जाते हैं वे सभी यज्ञार्थ कर्म हैं। यज्ञार्थ कर्म करनेसे आसक्ति बहुत जल्दी मिट जाती है तथा कर्मयोगीके सम्पूर्ण कर्म नष्ट हो जाते हैं (गीता 4। 23) अर्थात् वे कर्म स्वयं तो बन्धनकारक होते नहीं प्रत्युत पूर्वसंचित कर्मसमूहको भी समाप्त कर देते हैं।वास्तवमें मनुष्यकी स्थिति उसके उद्दश्यके अनुसार होती है क्रियाके अनुसार नहीं। जैसे व्यापारीका प्रधान उद्देश्य धन कमाना रहता है अतः वास्तवमें उसकी स्थिति धनमें ही रहती है और दुकान बंद करते ही उसकी वृत्ति धनकी तरफ चली जाती है। ऐसे ही यज्ञार्थ कर्म करते समय कर्मयोगीकी स्थिति अपने उद्देश्य परमात्मामें ही रहती है और कर्म समाप्त करते ही उसकी वृत्ति परमात्माकी तरफ चली जाती है।सभी वर्णोंके लिये अलगअलग कर्म हैं। एक वर्णके लिये कोई कर्म स्वधर्म है तो वही दूसरे वर्णोंके लिये (विहित न होनेसे) परधर्म अर्थात् अन्यत्र कर्म हो जाता है जैसे भिक्षासे जीवननिर्वाह करना ब्राह्मणके लिये तो स्वधर्म है पर क्षत्रियके लिये परधर्म है। इसी प्रकार निष्कामभावसे कर्तव्यकर्म करना मनुष्यका स्वधर्म है और सकामभावसे कर्म करना परधर्म है। जितने भी सकाम और निषिद्ध कर्म हैं वे सबकेसबअन्यत्रकर्म की श्रेणीमें ही हैं। अपने सुख मान बड़ाई आराम आदिके लिये जितने कर्म किये जायँ वे सबकेसब भी अन्यत्रकर्म हैं (टिप्पणी प0 126)। अतः छोटासेछोटा तथा बड़ासे़बड़ा जो भी कर्म किया जाय उसमें साधकको सावधान रहना चाहिये कि कहीं किसी स्वार्थकी भावनासे तो कर्म नहीं हो रहा है साधक उसीको कहते हैं जो निरन्तर सावधान रहता है। इसलिये साधकको अपनी साधनाके प्रति सतर्क जागरूक रहना ही चाहिये। अन्यत्रकर्म के विषयमें दो गुप्त भाव (1) किसीके आनेपर यदि कोई मनुष्य उसके प्रति आइये बैठिये आदि आदरसूचक शब्दोंका प्रयोग करता है पर भीतरसे अपनेमें सज्जनताका आरोप करता है अथवा ऐसा कहनेसे आनेवाले व्यक्तिपर मेरा अच्छा असर पड़ेगा इस भावसे कहता है तो इसमें स्वार्थकी भावना छिपी रहनेसे यह अन्यत्रकर्म ही है यज्ञार्थ कर्म नहीं।(2) सत्सङ्ग सभा आदिमें कोई व्यक्ति मनमें इस भावको रखते हुए प्रश्न करता है कि वक्ता और श्रोतागण मुझे अच्छा जानकार समझेंगे तथा उनपर मेरा अच्छा असर पड़ेगा तो यह अन्यत्रकर्म ही है यज्ञार्थ कर्म नहीं।तात्पर्य यह है कि साधक कर्म तो करे पर उसमें स्वार्थ कामना आदिका भाव नहीं रहना चाहिये। कर्मका निषेध नहीं है प्रत्युत सकामभावका निषेध है।साधकको भोग और ऐश्वर्यबुद्धिसे कोई भी कर्म नहीं करना चाहिये क्योंकि ऐसी बुद्धिमें भोगसक्ति और कामना रहती है जिससे कर्मयोगका आचरण नहीं हो पाता। निर्वाहबुद्धिसे कर्म करनेपर भी जीनेकी कामना बनी रहती है। अतः निर्वाहबुद्धि भी त्याज्य है। साधकको केवल साधनबुद्धिसे ही प्रत्येक कर्म करना चाहिये। सबसे उत्तम साधक तो वह है जो अपनी मुक्तिके लिये भी कोई कर्म न करके केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करता है। कारण कि अपना हित दूसरोंके लिये कर्म करनेसे होता है अपने लिये कर्म करनेसे नहीं। दूसरोंके हितमें ही अपना हित है। दूसरोंके हितसे अपना हित अलग अलग मानना ही गलती है। इसलिये लौकिक तथा शास्त्रीय जो कर्म किये जायँ वे सबकेसब केवल लोकहितार्थ होने चाहिये। अपने सुखके लिये किया गया कर्म तो बन्धनकारक है ही अपने व्यक्तिगत हितके लिये किया गया कर्म भी बन्धनकारक है। केवल अपने हितकी तरफ दृष्टि रखनेसे व्यक्तित्व बना रहता है। इसलिये और तो क्या जप चिन्तन ध्यान समाधि भी केवल लोकहितके लिये ही करे। तात्पर्य यह कि स्थूल सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरोंसे होनेवाली मात्र क्रिया संसारके लिये ही हो अपने लिये नहीं। कर्म संसारके लिय है और संसारसे सम्बन्धविच्छेद होनेपर परमात्माके साथ योग अपने लिये है। इसीका नाम हैकर्मयोग।लोकोऽयं कर्मबन्धनः कर्तव्यकर्म (यज्ञ) करनेका अधिकार मुख्यरूपसे मनुष्यको ही है। इसका वर्णन भगवान्ने आगे सृष्टिचक्रके प्रसङ्ग (3। 14 16) में भी किया है। जिसका उद्देश्य प्राणिमात्रका हित करना उनको सुख पहुँचाना होता है उसीके द्वारा कर्तव्यकर्म हुआ करते हैं। जब मनुष्य दूसरोंके हितके लिये कर्म न करके केवल अपने सुखके लिये कर्म करता है तब वह बँध जाता है।आसक्ति और स्वार्थभावसे कर्म करना ही बन्धनका कारण है। आसक्ति और स्वार्थके न रहनेपर स्वतः सबके हितके लिये कर्म होते हैं। बन्धन भावसे होता है क्रियासे नहीं। मनुष्य कर्मोंसे नहीं बँधता प्रत्युत कर्मोंमें वह जो आसक्ति और स्वार्थभाव रखता है उनसे ही वह बँधता है।तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर यहाँ मुक्तसङ्गः पदसे भगवान्का यह तात्पर्य है कि कर्मोंमें पदार्थोंमें तथा जिनसे कर्म किये जाते हैं उन शरीर मन बुद्धि आदि सामग्रीमें ममताआसक्ति होनेसे ही बन्धन होता है। ममता आसक्ति रहनेसे कर्तव्यकर्म भी स्वाभाविक एवं भलीभाँति नहीं होते। ममताआसक्ति न रहनेसे परहितके लिये कर्तव्यकर्मका स्वतः आचरण होता है और यदि कर्तव्यकर्म प्राप्त न हो तो स्वतः निर्विकल्पतामें स्वरूपमें स्थिति होती है। परिणामस्वरूप साधन निरन्तर होता है ओर असाधन कभी होता ही नहीं।आलस्य और प्रमादके कारण नियत कर्मका त्याग करना तामस त्याग कहलाता है (गीता 18। 7) जिसका फल मूढ़ता अर्थात् मूढ़योनियोंकी प्राप्ति है अज्ञानं तमसः फलम् (गीता 14। 16)। कर्मोंको दुःखरूप समझकर उनका त्याग करनाराजस त्याग कहलाता है (गीता 18। 8) जिसका फल दुःखोंकी प्राप्ति है रजसस्तु फलं दुःखम् (गीता 14। 16)। इसलिये यहाँ भगवान् अर्जुनको कर्मोंका त्याग करनेके लिये नहीं कहते प्रत्युत स्वार्थ ममता फलासक्ति कामना वासना पक्षपात आदिसे रहित होकर शास्त्रविधिके अनुसार सुचारुरूपसे उत्साहपूर्वक कर्तव्यकर्मोंको करनेकी आज्ञा देते हैं जो सात्त्विक त्याग कहलाता है (गीता 18। 9)। स्वयं भगवान् भी आगे चलकर कहते हैं कि मेरे लिये कुछ भी करना शेष नहीं है फिर भी मैं सावधानीपूर्वक कर्म करता हूँ (3। 2223)।कर्तव्यकर्मोंका अच्छी तरह आचरण करनेमें दो कारणोंसे शिथिलता आती है (1) मनुष्यका स्वभाव है कि वह पहले फलकी कामना करके ही कर्ममें प्रवृत्त होता है। जब वह देखता है कि कर्मयोगके अनुसार फलकी कामना नहीं रखनी है तब वह विचार करता है कि कर्म ही क्यों करूँ (2) कर्म आरम्भ करनेके बाद जब अन्तमें उसे पता लग जाय कि इसका फल विपरीत होगा तब वह विचार करता है कि मैं कर्म तो अच्छासेअच्छा करूँ पर फल विपरीत मिले तो फिर कर्म करूँ ही क्योंकर्मयोगी न तो कोई कामना करता है और न कोई नाशवान् फल ही चाहता है वह तो मात्र संसारका हित सामने रखकर ही कर्तव्यकर्म करता है। अतः उपर्युक्त दोनों कारणोंसे उसके कर्तव्यकर्ममें शिथिलता नहीं आ सकती। मार्मिक बातमनुष्यका प्रायः ऐसा स्वभाव हो गया है कि जिसमें उसको अपना स्वार्थ दिखायी देता है उसी कर्मको वह बड़ी तत्परतासे करता है। परन्तु वही कर्म उसके लिये बन्धनकारक हो जाता है। अतः इस बन्धनसे छूटनेके लिये उसे कर्मयोगके अनुसार आचरण करनेकी बड़ी आवश्यकता है।कर्मयोगमें सभी कर्म केवल दूसरोंके लिये किये जाते हैं अपने लिये कदापि नहीं। दूसरे कौनकौन हैं इसे समझना भी बहुत जरूरी है। अपने शरीरके सिवाय दूसरे प्राणीपदार्थ तो दूसरे हैं ही पर ये अपने कहलानेवाले स्थूलशरीर सूक्ष्मशरीर (इन्द्रियाँ मन बुद्धि प्राण) और कारणशरीर (जिसमें माना हुआ अहम् है) भी स्वयंसे दूसरे ही हैं (टिप्पणी प0 127)। कारण कि स्वयं (जीवात्मा) चेतन परमात्माका अंश है और ये शरीर आदि पदार्थ जड प्रकृतिके अंश है। समस्त क्रियाएँ जडमें और जडके लिये ही होती हैं। चेतनमें और चेतनके लिये कभी कोई क्रिया नहीं होती। अतः करना अपने लिये है ही नहीं कभी हुआ नहीं और हो सकता भी नहीं। हाँ संसारसे मिले हुए इन शरीर आदि जड पदार्थोंको चेतन जितने अंशमें मैं मेरा और मेरे लिये मान लेता है उतने अंशमें उसका स्वभाव अपने लिये करनेका हो जाता है। अतः दूसरोंके लिये कर्म करनेसे ममताआसक्ति सुगमतासे मिट जाती है।शरीरकी अवस्थाएँ (बचपन जवानी आदि) बदलनेपर भी मैं वही हूँ इस रूपमें अपनी एक निरन्तर रहनेवाली सत्ताका प्राणिमात्रको अनुभव होता है। इस अपरिवर्तनशील सत्ता (अपने होनेपन) की परमात्मतत्त्वके साथ स्वतः एकता है और परिवर्तनशील शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदिकी संसारके साथ स्वतः एकता है। हमारे द्वारा जो भी क्रिया की जाती है वह शरीर इन्द्रियों आदिके द्वारा ही की जाती है क्योंकि क्रियामात्रका सम्बन्ध प्रकृति और प्रकृतिजन्य पदार्थोंके साथ है स्वयं (अपने स्वरूप) के साथ नहीं। इसलिये शरीरके सम्बन्धके बिना हम कोई भी क्रिया नहीं कर सकते। इससे यह बात निश्चितरूपसे सिद्ध होती है कि हमें अपने लिये कुछ भी नहीं करना है जो कुछ करना है संसारके लिये ही करना है। कारण कि करना उसीपर लागू होता है जो स्वयं कर सकता है। जो स्वयं कुछ कर ही नहीं सकता उसके लियेकरने का विधान है ही नहीं। जो कुछ किया जाता है संसारकी सहायतासे ही किया जाता है। अतः करना संसारके लिये ही है। अपने लिये करने से ही मनुष्य कर्मोंसे बँधता है यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्रलोकोऽयं कर्मबन्धनः।विनाशी और परिवर्तनशील शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदिके साथ अपने अविनाशी और अपरिवर्तनशील स्वरूपका कोई सम्बन्ध नहीं है इसलिये अपना और अपने लिये कुछ भी नहीं है। शरीरादिकी सहायताके बिना हम कुछ नहीं कर सकते इसलिये अपने लिये कुछ भी नहीं करना है। अपने सत्स्वरूपमें कभी कोई कमी नहीं आती और कमी आये बिना कोई इच्छा नहीं होती इसलिये अपने लिये कुछ भी नहीं चाहिये। इस प्रकार जब क्रिया और पदार्थसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाता है (जो वास्तवमें है) तब यदि ज्ञानके संस्कार हैं तो स्वरूपका साक्षात्कार हो जाता है और यदि भक्तिके संस्कार हैं तो भगवान्में प्रेम हो जाता है। सम्बन्ध   पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि यज्ञ(कर्तव्यकर्म) के अतिरिक्त कर्म बन्धनकारक होते हैं। अतः इस बन्धनसे मुक्त होनेके लिये कर्मोंका स्वरूपसे त्याग न करके कर्तव्यबुद्धिसे कर्म करना आवश्यक है। अब कर्मोंकी अवश्यकर्तव्यताको पुष्ट करनेके लिये और भी हेतु बताते हैं।