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Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 50

भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 50

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्।।2.50।।

हिंदी अनुवाद - स्वामी रामसुख दास जी ( भगवद् गीता 2.50)

।।2.50।।बुद्धि(समता) से युक्त मनुष्य यहाँ जीवित अवस्थामें ही पुण्य और पाप दोनोंका त्याग कर देता है। अतः तू योग(समता) में लग जा क्योंकि योग ही कर्मोंमें कुशलता है।

हिंदी अनुवाद - स्वामी तेजोमयानंद

।।2.50।। समत्वबुद्धि युक्त पुरुष यहां (इस जीवन में) पुण्य और पाप इन दोनों कर्मों को त्याग देता है? इसलिये तुम योग से युक्त हो जाओ। कर्मों में कुशलता योग है।।

हिंदी टीका - स्वामी रामसुख दास जी

 2.49।। व्याख्या   दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगात्   बुद्धियोग अर्थात् समताकी अपेक्षा सकामभावसे कर्म करना अत्यन्त ही निकृष्ट है। कारण कि कर्म भी उत्पन्न और नष्ट होते हैं तथा उन कर्मोंके फलका भी संयोग और वियोग होता है। परन्तु योग (समता) नित्य है  उसका कभी वियोग नहीं होता। उसमें कोई विकृति नहीं होती। अतः समताकी अपेक्षा सकामकर्म अत्यन्त ही निकृष्ट हैं।सम्पूर्ण कर्मोंमें समता ही श्रेष्ठ है। समताके बिना तो मात्र जीव कर्म करते ही रहते हैं तथा उन कर्मोंके परिणाममें जन्मतेमरते और दुःख भोगते रहते हैं। कारण कि समताके बिना कर्मोंमें उद्धार करनेकी ताकत नहीं है। कर्मोंमें समता ही कुशलता है। अगर कर्मोंमें समता नहीं होगी तो शरीरमें अहंताममता हो जायगी और शरीरमें अहंताममता होना ही पशुबुद्धि है। भागवतमें शुकदेवजीने राजा परीक्षित्से कहा है  त्वं तु राजन् मरिष्येति पशुबुद्धिमिमां जहि।  (12। 5। 2) अर्थात् हे राजन् अब तुम यह पशुबुद्धि छोड़ दो कि मैं मर जाऊँगा।  दूरेण  कहनेका तात्पर्य है कि जैसे प्रकाश और अन्धकार कभी समकक्ष नहीं हो सकते ऐसे ही बुद्धियोग और सकामकर्म भी कभी समकक्ष नहीं हो सकते। इन दोनोंमें दिनरातकी तरह महान् अन्तर है। कारण कि बुद्धियोग तो परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला है और सकामकर्म जन्ममरण देनेवाला है। बुद्धौ शरणमन्विच्छ   तू बुद्धि (समता) की शरण ले। समतामें निरन्तर स्थित रहना ही उसकी शरण लेना है। समतामें स्थित रहनेसे ही तुझे स्वरूपमें अपनी स्थितिका अनुभव होगा। कृपणाः फलहेतवः   कर्मोंके फलका हेतु बनना अत्यन्त निकृष्ट है। कर्म कर्मफल कर्मसामग्री और शरीरादि करणोंके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेना ही कर्मफलका हेतु बनना है। अतः भगवान्ने सैंतालीसवें श्लोकमें  मा कर्मफलहेतुर्भूः  कहकर कर्मोंके फलका हेतु बननेमें निषेध किया है।कर्म ओर कर्मफलका विभाग अलग है तथा इन दोनोंसे रहित जो नित्य तत्त्व है उसका विभाग अलग है। वह नित्य तत्त्व अनित्य कर्मफलके आश्रित हो जाय इसके समान निकृष्टता और क्या होगी सम्बन्ध   पूर्व श्लोकमें जिस बुद्धिके आश्रयकी बात बतायी अब आगेके श्लोकमें उसी बुद्धिके आश्रयका फल बताते हैं।।।2.50।। व्याख्या बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते  समतायुक्त मनुष्य जीवित अवस्थामें ही पुण्यपापका त्याग कर देता है अर्थात् उसको पुण्यपाप नहीं लगते वह उनसे रहित हो जाता है। जैसे संसारमें पुण्यपाप होते ही रहते हैं पर सर्वव्यापी परमात्माको वे पुण्यपाप नहीं लगते ऐसे ही जो समतामें निरन्तर स्थित रहता है उसको पुण्यपाप नहीं लगते (गीता 2। 38)।समता एक ऐसी विद्या है जिससे मनुष्य संसारमें रहता हुआ ही संसारसे सर्वथा निर्लिप्त रह सकता है। जैसे कमलका पत्ता जलसे ही उत्पन्न होता है और जलमें ही रहता है पर वह जलसे लिप्त नहीं होता ऐसे ही समतायुक्त पुरुष संसारमें रहते हुए भी संसारसे निर्लिप्त रहता है। पुण्यपाप उसका स्पर्श नहीं करते अर्थात् वह पुण्यपापसे असङ्ग हो जाता है।वास्तवमें यह स्वयं (चेतनस्वरूप) पुण्यपापसे रहित ही। केवल असत् पदार्थों शरीरादिके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही पुण्यपाप लगते हैं। अगर यह असत् पदार्थोंके साथ सम्बन्ध न जोड़े तो यह आकाशकी तरह निर्लिप्त रहेगा इसको पुण्यपापनहीं लगेंगे। तस्माद्योगाय युज्यस्व   इसलिये तुम योगमें लग जाओ अर्थात् निरन्तर समतामें स्थित रहो। वास्तवमें समता तुम्हारा स्वरूप है। अतः तुम नित्यनिरन्तर समतामें ही स्थित रहते हो। केवल रागद्वेषके कारण तुम्हारेको उस समताका अनुभव नहीं हो रहा है। अगर तुम हरदम समतामें स्थित न रहते तो सुख और दुःखका ज्ञान तुम्हें कैसे होता क्योंकि ये दोनों ही अलगअलग हैं। जब इन दोनोंका तुम्हें ज्ञान होता है तो तुम इनके आनेजानेमें सदा समरूपसे रहते हो। इसी समताका तुम अनुभव करो। योगः कर्मसु कौशलम्   कर्मोंमें योग ही कुशलता है अर्थात् कर्मोंकी सिद्धिअसिद्धिमें और उन कर्मोंके फलके प्राप्तिअप्राप्तिमें सम रहना ही कर्मोंमें कुशलता है। उत्पत्ति विनाशशील कर्मोंमें योगके सिवाय दूसरी कोई महत्त्वकी चीज नहीं है।इन पदोंमें भगवान्ने योगकी परिभाषा नहीं बतायी है प्रत्युत योगकी महिमा बतायी है। अगर इन पदोंका अर्थ कर्मोंमें कुशलता ही योग है ऐसा किया जाय तो क्या आपत्ति है अगर ऐसा अर्थ किया जायगा तो जो बड़ी कुशलतासे सावधानीपूर्वक चोरी करता है उसका वह चोरीरूप कर्म भी योग हो जायगा। अतः ऐसा अर्थ करना अनुचित है। कोई कह सकता है कि हम तो विहित कर्मोंको ही कुशलतापूर्वक करनेका नाम योग मानते हैं। परन्तु ऐसा माननेसे मनुष्य कुशलतापूर्वक साङ्गोपाङ्ग किये गये कर्मोंके फलमें बँध जायगा जिससे उसकी स्थिति समतामें नहीं रहेगी। अतः यहाँ कर्मोंमें योग ही कुशलता है ऐसा अर्थ लेना ही उचित है। कारण कि कर्मोंको करते हुए भी जिसके अन्तःकरणमें समता रहती है वह कर्म और उनके फलमें बँधेगा नहीं। इसलिये उत्पत्तिविनाशशील कर्मोंको करते हुए सम रहना ही कुशलता है बुद्धिमानी है। दूसरी बात पीछेके दो श्लोकोंमें तथा इस श्लोकके पूर्वार्धमें भी योग (समता) का ही प्रसङ्ग है कुशलताका प्रसङ्ग ही नहीं है। इसलिये भी कर्मोंमें योग ही कुशलता है यह अर्थ लेना प्रसङ्गके अनुसार युक्तियुक्त है। सम्बन्ध   अब पीछेके श्लोकको पुष्ट करनेके लिये भगवान् आगेके श्लोकमें उदाहरण देते हैं।

हिंदी टीका - स्वामी चिन्मयानंद जी

।।2.50।। भावनाओं की दुर्बलताओं से ऊपर उठकर जो पुरुष समत्व बुद्धियुक्त हो जाता है वह पाप और पुण्य दोनों के बन्धनों से मुक्त हो जाता है। पाप और पुण्य मन की धारणायें हैं और उनकी प्रतिक्रियाएँ मन पर वासनाओं के रूप में अंकित होती हैं। मनरूपी विक्षुब्ध समुद्र के साथ जो व्यक्ति तादात्म्य नहीं करता वह वासनाओं की ऊँचीऊँची तरंगों के द्वारा न तो ऊपर फेंका जायेगा और न नीचे ही डुबोया जायेगा। यहाँ वर्णित मन का बुद्धि के साथ युक्त होना ही बुद्धियुक्त शब्द का अर्थ है।इस सम्पूर्ण प्रकरण में गीता का मानव मात्र को आह्वान है कि वह केवल इन्द्रियों के विषय स्थूल देह और मन के स्तर पर ही न रहे जो उसके व्यक्तित्व का बाह्यतम पक्ष है। इनसे सूक्ष्मतर बुद्धि का उपयोग कर उसको अपने वास्तविक पुरुषत्व को व्यक्त करना चाहिये। प्राणियों की सृष्टि में केवल बौद्धिक क्षमताओं के कारण ही मनुष्य को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। जब तक मनुष्य प्रकृति के इस विशिष्ट उपहार का सम्यक् प्रकार से उपयोग नहीं करता तब तक वह अपने मनुष्यत्व के अधिकार से वंचित ही रह जाता है।अर्जुन से मानसिक उन्माद त्यागकर वीर पुरुष के समान परिस्थितियों का स्वामी बनकर रहने के लिये भगवान् कहते हैं। उस समय अर्जुन इतना भावुक और दुर्बल हो गया था कि वह अपनी व अन्यों के शारीरिक सुरक्षा की चिन्ता करने लगा था। विकास की सीढ़ी पर मनुष्यत्व को प्राप्त कर जो अपनी विशेष क्षमताओं का पूर्ण उपयोग करता है वही व्यक्ति जन्म जन्मान्तरों में अर्जित वासनाओं के बन्धन से मुक्त हो जाता है। इसलिये तुम योग से युक्त हो जाओ यह भगवान् श्रीकृष्ण का उपदेश है। इसके पूर्व समत्व को योग कहा गया था। अब इस सन्दर्भ में व्यासजी योग की और विशद परिभाषा देते हैं कि कर्म में कुशलता योग है।किसी भी विषय के शास्त्रीय ग्रन्थ में यदि भिन्नभिन्न अध्यायों में एक ही शब्द की विभिन्न परिभाषायें दी गई हों तो समझने में कठिनाई और भ्रांति होगी। फिर धर्म के इस शास्त्रीय ग्रन्थ में एक ही शब्द की विभिन्न परिभाषायें कैसे बताई हुई हैं उपर्युक्त परिभाषा को ठीक से समझने पर इस समस्या का स्वयं समाधान हो जायेगा। योग की पूर्वोक्त परिभाषा यहाँ भी संग्रहीत है अन्यथा मन के समभाव का अर्थ अकर्मण्यता एवं शिथिलता उत्पन्न करने वाली मन की समता को ही कोई समझ सकता है। इस श्लोक में ऐसी त्रुटिपूर्ण धारणा को दूर करते हुये कहा गया है कि समस्त प्रकार के द्वन्द्वों में मन के सन्तुलन को न खोकर कुशलतापूर्वक कर्म करना ही कम्र्ायोग है।इस श्लोक के स्पष्टीकरण से श्रीकृष्ण का उद्देश्य ज्ञात होता है कि कर्मयोग की भावना से कर्म करने पर वासनाओं का क्षय होता है। वासनाओं के दबाव से ही मन में विक्षेप उठते हैं। किन्तु वासना क्षय के कारण मन स्थिर और शुद्ध होकर मनन निदिध्यासन और आत्मानुभूति के योग्य बन जाता है।योग शब्द का इस अथ मेंर् प्रयोग कर व्यास जी हमारे मन में उसके प्रति व्याप्त भ्राँति को दूर कर देते हैं।समत्व भाव एवं कर्म में कुशलता की क्या आवश्यकता है उत्तर में कहते हैं