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Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 14

भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 14

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।2.14।।

हिंदी अनुवाद - स्वामी रामसुख दास जी ( भगवद् गीता 2.14)

।।2.14।।हे कुन्तीनन्दन इन्द्रियोंके जो विषय (जड पदार्थ) हैं वे तो शीत (अनुकूलता) और उष्ण (प्रतिकूलता) के द्वारा सुख और दुःख देनेवाले हैं। वे आनेजानेवाले और अनित्य हैं। हे भरतवंशोद्भव अर्जुन उनको तुम सहन करो।

हिंदी अनुवाद - स्वामी तेजोमयानंद

।।2.14।। हे कुन्तीपुत्र शीत और उष्ण और सुख दुख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग का प्रारम्भ और अन्त होता है वे अनित्य हैं? इसलिए? हे भारत उनको तुम सहन करो।।

हिंदी टीका - स्वामी रामसुख दास जी

 2.14।। व्याख्या   यहाँ एक शंका होती है कि इन चौदहवेंपंद्रहवें श्लोकोंसे पहले (11 से 13) और आगे (16 से 30 तक) देही और देह इन दोनोंका ही प्रकरण है। फिर बीचमें मात्रास्पर्श के ये दो श्लोक (प्रकरणसे अलग) कैसे आये इसका समाधान यह है कि जैसे बारहवें श्लोकमें भगवान्ने सम्पूर्ण जीवोंके नित्यस्वरूपको बतानेके लिये किसी कालमें मैं नहीं था ऐसी बात नहीं है ऐसा कहकर अपनेको उन्हींकी पंक्तिमें रख दिया ऐसे ही शरीर आदि मात्र प्राकृत पदार्थोंको अनित्य विनाशी परिवर्तनशील बतानेके लिये भगवान्ने यहाँ मात्रास्पर्श की बात कही है। तु   नित्यत्तत्त्वसे देहादि अनित्य वस्तुओंको अलग बतानेके लिये यहाँ  तु  पद आया है। मात्रास्पर्शाः   जिनसे मापतौल होता है अर्थात् जिनसे ज्ञान होता है उन (ज्ञानके साधन) इन्द्रियों और अन्तःकरणका नाम  मात्रा  है। मात्रासे अर्थात् इन्द्रियों और अन्तःकरणसे जिनका संयोग होता है उनका नाम  स्पर्श  है। अतः इन्द्रियों और अन्तःकरणसे जिनका ज्ञान होता है ऐसे सृष्टिके मात्र पदार्थ  मात्रास्पर्शाः  हैं।यहाँ  मात्रास्पर्शाः  पदसे केवल पदार्थ ही क्यों लिये जायँ पदार्थोंका सम्बन्ध क्यों न लिया जाय अगर हम यहाँ  मात्रास्पर्शाः  पदसे केवल पदार्थोंका सम्बन्ध ही लें तो उस सम्बन्धको  आगमापायिनः  (आनेजानेवाला) नहीं कह सकते क्योंकि सम्बन्धकी स्वीकृति केवल अन्तःकरणमें न होकर स्वयंमें (अहम्में) होती है। स्वयं नित्य है इसलिये उसमें जो स्वीकृति हो जाती है वह भी नित्यजैसी ही हो जाती है। स्वयं जबतक उस स्वीकृतिको नहीं छोड़ता तबतक वह स्वीकृति ज्योंकीत्यों बनी रहती है अर्थात् पदार्थोंका वियोग हो जानेपर भी पदार्थोंके न रहनेपर भी उन पदार्थोंका सम्बन्ध बना रहता है  (टिप्पणी प0 52) । जैसे कोई स्त्री विधवा हो गयी है अर्थात् उसका पतिसे सदाके लिये वियोग हो गया है पर पचास वर्षके बाद भी उसको कोई कहता है कि यह अमुककी स्त्री है तो उसके कान खड़े हो जाते हैं इससे सिद्ध हुआ कि सम्बन्धी(पति) के न रहनेपर भी उसके साथ माना हुआ सम्बन्ध सदा बना रहता है। इस दृष्टिसे उस सम्बन्धको आनेजानेवाला कहना बनता नहीं अतः यहाँ  मात्रास्पर्शाः  पदसे पदार्थोंका सम्बन्ध न लेकर मात्र पदार्थ लिये गये हैं। शीतोष्णसुखदुःखदाः   यहाँ शीत और उष्ण शब्द अनुकूलता और प्रतिकूलताके वाचक हैं। अगर इनका अर्थ सरदी और गरमी लिया जाय तो ये केवल त्वगिन्द्रिय(त्वचा)के विषय हो जायँगे जो कि एकदेशीय हैं। अतः शीतका अर्थ अनुकूलता और उष्णका अर्थ प्रतिकूलता लेना ही ठीक मालूम देता है।मात्र पदार्थ अनुकूलताप्रतिकूलताके द्वारा सुखदुःख देनेवाले हैं अर्थात् जिसको हम चाहते हैं ऐसी अनुकूल वस्तु व्यक्ति परिस्थिति घटना देश काल आदिके मिलनेसे सुख होता है और जिसको हम नहीं चाहते ऐसी प्रतिकूल वस्तु व्यक्ति परिस्थिति आदिके मिलनेसे दुःख होता है। यहाँ अनुकूलताप्रतिकूलता कारण हैं और सुखदुःख कार्य हैं। वास्तवमें देखा जाय तो इन पदार्थोंमें सुखदुःख देनेकी सामर्थ्य नहीं है। मनुष्य इनके साथ सम्बन्ध जोड़कर इनमें अनुकूलताप्रतिकूलताकी भावना कर लेता है जिससे ये पदार्थ सुखदुःख देनेवाले दीखते हैं। अतः भगवान्ने यहाँ  सुखदुःखदाः  कहा है। आगमापायिनः   मात्र पदार्थ आदिअन्तवाले उत्पत्तिविनाशशील और आनेजानेवाले हैं। वे ठहरनेवाले नहीं है क्योंकि वे उत्पत्तिसे पहले नहीं थे और विनाशके बाद भी नहीं रहेंगे। इसलिये वे  आगमापायी  हैं। अनित्याः   अगर कोई कहे कि वे उत्पत्तिसे पहले और विनाशके बाद भले ही न हों पर मध्यमें तो रहते ही होंगे तो भगवान् कहते हैं कि अनित्य होनेसे वे मध्यमें भी नहीं रहते। वे प्रतिक्षण बदलते रहते हैं। इतनी तेजीसे बदलते हैं कि उनको उसी रूपमें दुबारा कोई देख ही नहीं सकता क्योंकि पहले क्षण वे जैसे थे दूसरे क्षण वे वैसे रहते ही नहीं। इसलिये भगवान्ने उनको  अनित्याः  कहा है।केवल वे पदार्थ ही अनित्य परिवर्तनशील नहीं हैं प्रत्युत जिनसे उन पदार्थोंका ज्ञान होता है वे इन्द्रियाँ और अन्तःकरण भी परिवर्तनशील हैं। उनके परिवर्तनको कैसे समझें जैसे दिनमें काम करतेकरते शामतक इन्द्रियों आदिमें थकावट आ जाती है और सबेरे तृप्तिपूर्वक नींद लेनेपर उनमें जो ताजगी आयी थी वह शामतक नहीं रहती। इसलिये पुनः नींद लेनी पड़ती है जिससे इन्द्रियोंकी थकावट मिटती है और ताजगीका अनुभव होता है। जैसे जाग्रत्अवस्थामें प्रतिक्षण थकावट आती रहती है ऐसे ही नींदमें प्रतिक्षण ताजगी आती रहती है। इससे सिद्ध हुआ कि इन्द्रियों आदिमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है।यहाँ मात्र पदार्थोंको स्थूलरूपसे  आगमापायिनः  और सूक्ष्मरूपसे  अनित्याः  कहा गया है। इनको अनित्यसे भी सूक्ष्म बतानेके लिये आगे सोलहवें श्लोकमें इनको  असत्  कहेंगे और पहले जिस नित्यतत्त्वका वर्णन हुआ है उसको  सत्  कहेंगे। तांस्तितिक्षस्व  ये जितने मात्रास्पर्श अर्थात् इन्द्रियोंके विषय हैं उनके सामने आनेपर यह अनुकूल है और यह प्रतिकूल है ऐसा ज्ञान होना दोषी नहीं है प्रत्युत उनको लेकर अन्तःकरणमें रागद्वेष हर्षशोक आदि विकार पैदा होना ही दोषी है। अतः अनुकूलताप्रतिकूलताका ज्ञान होनेपर भी रागद्वेषादि विकारोंको पैदा न होने देना अर्थात् मात्रास्पर्शोंमें निर्विकार रहना ही उनको सहना है। इस सहनेको ही भगवान्ने  तितिक्षस्व  कहा है।दूसरा भाव यह है कि शरीर इन्द्रियाँ अन्तःकरण आदिकी क्रियाओँका अवस्थाओंका आरम्भ और अन्त होता है तथा उनका भाव और अभाव होता है। वे क्रियाएँ अवस्थाएँ तुम्हारेमें नहीं हैं क्योंकि तुम उनको जाननेवाले हो उनसे अलग हो। तुम स्वयं ज्योंकेत्यों रहते हो। अतः उन क्रियाओंमें अवस्थाओंमें तुम निर्विकार रहो। इनमें निर्विकार रहना ही तितिक्षा है। सम्बन्ध   पूर्वश्लोकमें मात्रास्पर्शोंकी तितिक्षाकी बात कही। अब ऐसी तितिक्षासे क्या होगा इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

हिंदी टीका - स्वामी चिन्मयानंद जी

।।2.14।। विषय ग्रहण की वेदान्त की प्रक्रिया के अनुसार बाह्य वस्तुओं का ज्ञान इन्द्रियों के द्वारा होता है। इन्द्रियाँ तो केवल उपकरण हैं जिनके द्वारा जीव विषय ग्रहण करता है उनको जानता है। जीव के बिना केवल इन्द्रियाँ विषयों का ज्ञान नहीं करा सकतीं।यह तो सर्वविदित है कि एक ही वस्तु दो भिन्न व्यक्तियों को भिन्न प्रकार का अनुभव दे सकती है। एक ही वस्तु के द्वारा जो दो भिन्न अनुभव होते हैं उसका कारण उन दो व्यक्तियों की मानसिक संरचना का अन्तर है।यह भी देखा गया है कि व्यक्ति को एक समय जो वस्तु अत्यन्त प्रिय थी वही जीवन की दूसरी अवस्था में अप्रिय हो जाती है क्योंकि जैसेजैसे समय व्यतीत होता जाता है उसके मन में भी परिवर्तन होता जाता है। संक्षेप में यह स्पष्ट है कि जब हमारा इन्द्रियों के द्वारा बाह्य विषयों के साथ सम्पर्क होता है तभी किसी प्रकार का अनुभव भी संभव है।जो पुरुष यह समझ लेता है कि जगत् की वस्तुयें नित्य परिवर्तनशील हैं उत्पन्न और नष्ट होती रहती हैं वह पुरुष इन वस्तुओं के कारण स्वयं को कभी विचलित नहीं होने देगा। काल के प्रवाह में भविष्य की घटनायें वर्तमान का रूप लेती हैं और हमें विभिन्न अनुभवों को प्रदान करके निरन्तर भूतकाल में समाविष्ट हो जाती हैं। जगत् की कोई भी वस्तु एक क्षण के लिये भी विकृत हुये बिना नहीं रह सकती । यहाँ परिवर्तन ही एक अपरिवर्तनशील नियम है।इस नियम को समझ कर आदि और अन्त से युक्त वस्तुओं के होने या नहीं होने से बुद्धिमान पुरुष को शोक का कोई कारण नहीं रह जाता। शीत और उष्ण सफलता और असफलता सुख और दुख कोई भी नित्य नहीं हैं। जब वस्तुस्थिति ऐसी है तो प्रत्येक परिवर्तित परिस्थिति के कारण क्षुब्ध या चिन्तित होना अज्ञान का ही लक्षण है। जीवन में आने वाले कष्टों को चिन्तित हुये बिना शान्तिपूर्वक सहन करना चाहिये। सभी प्रकार की अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में विवेकी पुरुष इस तथ्य को सदा ध्यान में रखता है कि यह भी बीत जायेगा।जगत् की वस्तुयें परिच्छिन्न हैं क्योंकि उनका आदि है और अन्त है। भगवान् कहते हैं कि ये वस्तुयें स्वभाव से ही अनित्य हैं। अनित्य शब्द से तात्पर्य यह है कि एक ही वस्तु किसी एक व्यक्ति के लिये ही कभी सुखदायक तो कभी दुखदायक हो सकती है।शीतउष्ण आदि को समान भाव से सहने वाले व्यक्ति को क्या लाभ मिलेगा सुनिये