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Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 44

भगवद् गीता अध्याय 18 श्लोक 44

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्।।18.44।।

हिंदी अनुवाद - स्वामी रामसुख दास जी ( भगवद् गीता 18.44)

।।18.44।।खेती करना? गायोंकी रक्षा करना और शुद्ध व्यापार करना -- ये सबकेसब वैश्यके स्वाभाविक कर्म हैं? तथा चारों वर्णोंकी सेवा करना शूद्रका भी स्वाभाविक कर्म है।

हिंदी अनुवाद - स्वामी तेजोमयानंद

।।18.44।। कृषि? गौपालन तथा वाणिज्य ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं? और शूद्र का स्वाभाविक कर्म है परिचर्या अर्थात् सेवा करना।।

हिंदी टीका - स्वामी रामसुख दास जी

।।18.44।। व्याख्या --   कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् -- खेती करना? गायोंकी रक्षा करना? उनकी वंशवृद्धि करना और शुद्ध व्यापार करना -- ये कर्म वैश्यमें स्वाभाविक होते हैं।शुद्ध व्यापार करनेका तात्पर्य है -- जिस देशमें? जिस समय? जिस वस्तुकी आवश्यकता हो? लोगोंके हितकी भावनासे उस वस्तुको (जहाँ वह मिलती हो? वहाँसे ला करके) उसी देशमें पहुँचाना प्रजाकी आवश्यक वस्तुओंके अभावकी पूर्ति कैसे हो? वस्तुओंके अभावमें कोई कष्ट न पाये -- इस भावसे सच्चाईके साथ वस्तुओंका वितरण करना।,भगवान् श्रीकृष्ण (नन्दबाबाको लेकर) अपनेको वैश्य ही मानते हैं (टिप्पणी प0 929)। इसलिये उन्होंने स्वयं गायों और बछड़ोंको चराया। मनु महाराजने वैश्यवृत्तिमें पशूनां रक्षणम् (मनुस्मृति 1। 90) (पशुओंकी रक्षा करना) कहा है? पर यहाँ भगवान् (उपर्युक्त पदोंसे) अपने जातिभाईयोंसे मानो यह कहते हैं कि तुम लोग सब पशुओंका पालन? उनकी रक्षा न कर सको तो कमसेकम गायोंका पालन और उनकी रक्षा जरूर करना। गायोंकी वृद्धि न कर सको तो कोई बात नहीं परन्तु उनकी रक्षा जरूर करना? जिससे हमारा गोधन घट न जाय। इसलिये वैश्यसमाजको चाहिये कि वह गायोंकी रक्षामें अपना तनमनधन लगा दे? उनकी रक्षा करनेमें अपनी शक्ति बचाकर न रखे।गोरक्षासम्बन्धी विशेष बातमनुष्योंके लिये गाय सब दृष्टियोंमें पालनीय है। गायसे अर्थ? धर्म? काम और मोक्ष -- इन चारों पुरुषार्थोंकी सिद्धि होती है। आजके अर्थप्रधान युगमें तो गाय अत्यन्त ही उपयोगी है। गोपालनसे? गायके दूध? घी? गोबर आदिसे धनकी वृद्धि होती है। हमारा देश कृषिप्रधान है। अतः यहाँ खेतीमें जितनी प्रधानता बैलोंकी है? उतनी प्रधानता अन्य किसीकी भी नहीं है। भैंसेके द्वारा भी खेती की जाती है? पर खेतींमें जितना काम बैल कर सकता है? उतना भैंसा नहीं कर सकता। भैंसा बलवान् तो होता है? पर वह धूप सहन नहीं कर सकता। धूपमें,चलनेसे वह जीभ निकाल देता है? जब कि बैल धूपमें भी चलता रहता है। कारण कि भैंसेमें सात्त्विक बल नहीं होता? जबकि बैलमें सात्त्विक बल होता है। बैलोंकी अपेक्षा भैंसे कम भी होते हैं। ऐसे ही ऊँटसे भी खेती की जाती है? पर ऊँट भैंसेसे भी कम होते हैं और बहुत महँगे होते हैं। खेती करनेवाला हरेक आदमी ऊँट नहीं खरीद सकता। आजकल अच्छेअच्छे जवान बैल मारे जानेके कारण बैल भी महँगे हो गये हैं? तो भी वे ऊँटजितने महँगे नहीं हैं। यदि घरोंमें गायें रखी जायँ तो बैल घरोंमें ही पैदा हो जाते हैं? खरीदने नहीं पड़ते। विदेशी गायोंके जो बैल होते हैं? वे खेतीमें काम नहीं आ सकते क्योंकि उनके कन्धे न होनेसे उनपर जुआ नहीं रखा जा सकता।गाय पवित्र होती है। उसके शरीरका स्पर्श करनेवाली हवा भी पवित्र होती है। गायके गोबरगोमूत्र भी पवित्र होते हैं। गोबरसे लिपे हुए घरोंमें प्लेग? हैजा आदि भयंकर बीमारियाँ नहीं आतीं। इसके सिवाय युद्धके समय गोबरसे लिपे हुए मकानोंपर बमका उतना असर नहीं होता? जितना सीमेण्ट आदिसे बने हुए मकानोंपर होता है। गोबरमें जहर खींचनेकी विशेष शक्ति होती है। काशीमें कोई व्यक्ति साँप काटनेसे मर गया। लोग उसकी दाहक्रिया करनेके लिये उसको गङ्गाके किनारे ले गये। वहाँपर एक साधु रहते थे। उन्होंने पूछा कि इस व्यक्तिको क्या हुआ लोगोंने कहा कि यह साँप काटनेसे मरा है।साधुने कहा कि यह मरा नहीं है? तुमलोग गायका गोबर ले आओ। गोबर लाया गया। साधुने उस व्यक्तिकी नासिकाको छोड़कर उसके पूरे शरीरमें (नीचेऊपर) गोबरका लेप कर दिया। आधे घण्टेके बाद गोबरका फिर दूसरा लेप किया। इससे उस व्यक्तिके श्वास चलने लगे और वह जी उठा। हृदयके रोगोंको दूर करनेके लिये गोमूत्र बहुत उपयोगी है। छोटी बछड़ीका गोमूत्र रोज तोलादोतोला पीनेसे पेटके रोग दूर हो जाते हैं। एक सन्तको दमाकी शिकायत थी? उनको गोमूत्रसेवनसे बहुत फायदा हुआ है। आजकल तो गोबर और गोमूत्रसे अनेक रोगोंकी दवाइयाँ बनायी जा रही हैं। गोबरसे गैस भी बनने लगी है।खेतोंमें गोबरगोमूत्रकी खादसे जो अन्न पैदा होता है? वह भी पवित्र होता है। खेतोंमें गायोंके रहनेसे? गोबर और गोमूत्रसे जमीनकी जैसी पुष्टि होती है? वैसी पुष्टि विदेशी रासायनिक खादोंसे नहीं होती। जैसे? एक बार अंगूरकी खेती करनेवालेने बताया कि गोबरकी खाद डालनेसे अंगूरके गुच्छे जितने बड़ेबड़े होते हैं? उतने विदेशी खाद डालनेसे नहीं होते। विदेशी खाद डालनेसे कुछ ही वर्षोंमें जमीन खराब हो जाती है अर्थात् उसकी उपजाऊशक्ति नष्ट हो जाती है। परन्तु गोबरगोमूत्रसे जमीनकी उपजाऊशक्ति ज्योंकीत्यों बनी रहती है। विदेशोंमें रासायनिक खादसे बहुतसे खेत खराब हो गये हैं? जिन्हें उपजाऊ बनानेके लिये वे लोग भारतसे गोबर मँगवा रहे हैं और भारतसे गोबरके जहाज भरकर विदेशोंमें जा रहे हैं।हमारे देशकी गायें सौम्य और सात्त्विक होती हैं। अतः उनका दूध भी सात्त्विक होता है? जिसको पीनेसे बुद्धि तीक्ष्ण होती है और स्वभाव शान्ति? सौम्य होता है। विदेशी गायोंका दूध तो ज्यादा होता है? पर उन गायोंमें गुस्सा बहुत होता है। अतः उनका दूध पीनेसे मनुष्यका स्वभाव क्रूर होता है। भैंसका दूध भी ज्यादा होता है? पर वह दूध सात्त्विक नहीं होता। उससे सात्त्विक बल नहीं आता। सैनिकोंके घोड़ोंको गायका दूध पिलाया जाता है? जिससे वे घोड़े बहुत तेज होते हैं। एक बार सैनिकोंने परीक्षाके लिये कुछ घोड़ोंको भैंसका दूध पिलाया? जिससे घोड़े खूब मोटे हो गये। परन्तु जब नदी पार करनेका काम पड़ा तो वे घोड़े पानीमें बैठ गये। भैंस पानीमें बैठा करती है अतः वही स्वभाव घोड़ोंमें भी आ गया। ऊँटनीका दूध भी निकलता है? पर उस दूधका दही? मक्खन होता ही नहीं। उसका दूध तामसी होनेसे दुर्गति देनेवाला होता है। स्मृतियोंमें ऊँट? कुत्ता? गधा आदिको अस्पृश्य बताया गया है।सम्पूर्ण धार्मिक कार्योंमें गायकी मुख्यता है। जातकर्म? चूड़ाकर्म? उपनयन आदि सोलह संस्कारोंमें गायका? उसके दूध? घी? गोबर आदिका विशेष सम्बन्ध रहता है। गायके घीसे ही यज्ञ किया जाता है। स्थानशुद्धिके लिये गोबर का ही चौका लगाया जाता है। श्राद्धकर्ममें गायके दूधकी खीर बनायी जाती है। नरकोंसे,बचनेके लिये गोदान किया जाता है। धार्मिक कृत्योंमें पञ्चगव्य काममें लाया जाता है? जो गायके दूध? दही? घी? गोबर और गोमूत्र -- इन पाँचोंसे बनता है।कामनापूर्तिके लिये किये जानेवाले यज्ञोंमें गायका घी आदि काममें आता है। रघुवंशके चलनेमें गायकी ही प्रधानता थी। पौष्टिक? वीर्यवर्धक चीजोंमें भी गायके दूध और घीका मुख्य स्थान है।निष्कामभावसे गायकी सेवा करनेसे मुक्ति होती है। गायकी सेवा करनेमात्रसे अन्तःकरण निर्मल होता है। भगवान् श्रीकृष्णने भी बिना जूतीके गोचारणकी लीला की थी? इसलिये उनका नाम गोपाल पड़ा। प्राचीनकालमें ऋषिलोग वनमें रहते हुए अपने पास गाय रखा करते थे। गायके दूध? घीसे उनकी बुद्धि प्रखर? विलक्षण होती थी? जिससे वे बड़ेबड़े ग्रन्थोंकी रचना किया करते थे। आजकल तो उन ग्रन्थोंको ठीकठीक समझनेवाले भी कम हैं। गायके दूधघीसे वे दीर्घायु होते थे। इसलिये गायके घीका एक नाम आयु भी है। बड़ेबड़े राजालोग भी उन ऋषियोंके पास आते थे और उनकी सलाहसे राज्य चलाते थे।गोरक्षाके लिये बलिदान करनेवालोंकी कथाओंसे इतिहास? पुराण भरे पड़े हैं। बड़े भारी दुःखकी बात है कि आज हमारे देशमें पैसोंके लोभसे रोजाना हजारोंकी संख्यामें गायोंकी हत्या की जा रही है अगर इसी तरह गोहत्या चलती रही तो एक समय गोवंश समाप्त हो जायगा। जब गायें नहीं रहेंगी? तब क्या दशा होगी? कितनी आफतें आयेंगी -- इसका अन्दाजा नहीं लगाया जा सकता। जब गायें खत्म हो जायेंगी? तब गोबर नहीं रहेगा और गोबरकी खाद न रहनेसे जमीन भी उपजाऊ नहीं रहेगी। जमीनके उपजाऊ न रहनेसे खेती कैसे होगी खेती न होनेसे अन्न तथा वस्त्र (कपास) कैसे मिलेगा लोगोंको शरीरनिर्वाहके लिये अन्नजल और वस्त्र भी मिलना मुश्किल हो जायगा। गाय और उसके दूध? घी? गोबर आदिके न रहनेसे प्रजा बहुत दुःखी हो जायगी। गोधनके अभावमें देश पराधीन और दुर्बल हो जायगा। वर्तमानमें भी अकाल? अनावृष्टि? भूकम्प? आपसी कलह आदिके होनेमें गायोंकी हत्या मुख्य कारण है। अतः अपनी पूरी शक्ति लगाकर हर हालतमें गायोंकी रक्षा करना? उनको कत्लखानोंमें जानेसे रोकना हमारा परम कर्तव्य है।गायोंकी रक्षाके लिये भाईबहनोंको चाहिये कि वे गायोंका पालन करें? उनको अपने घरोंमें रखें। गायका ही दूधघी खायें? भैंस आदिका नहीं। घरोंमें गोबरगैसका प्रयोग किया जाय। गायोंकी रक्षाके उद्देश्यसे ही गोशालाएँ बनायी जाएँ? दूधके उद्देश्यसे नहीं। जितनी गोचरभूमियाँ हैं? उनकी रक्षा की जाय तथा सरकारसे और गोचरभूमियाँ छुड़ाई जायँ। सरकारकी गोहत्यानितिका विरोध किया जाय और सरकारसे अनुरोध किया जाय कि वह देशकी रक्षाके लिये पूरे देशमें तत्काल पूर्णरूपसे गोहत्या बन्द करे।परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् -- चारों वर्णोंकी सेवा करना? सेवाकी सामग्री तैयार करना और चारों वर्णोंके कार्योंमें कोई बाधा? अड़चन न आये? सबको सुखआराम हो -- इस भावसे अपनी बुद्धि? योग्यता? बलके द्वारा सबकी सेवा करना शूद्रका स्वाभाविक कर्म है।यहाँ एक शङ्का पैदा होती है कि भगवान्ने चारों वर्णोंकी उत्पत्तिमें सत्त्व? रज और तम -- इन तीन गुणोंको कारण बताया। उसमें तमोगुणकी प्रधानतासे शूद्रकी उत्पत्ति बतायी और गीतामें जहाँ तमोगुणका वर्णन हुआ है? वहाँपर उसके अज्ञान? प्रमाद? आलस्य? निद्रा? अप्रकाश? अप्रवृत्ति और मोह -- ये सात अवगुण बताये हैं (गीता 14। 8 13। 17)। अतः ऐसे तमोगुणकी प्रधानतावाले शूद्रसे सेवा कैसे होगी क्योंकि वह आलस्य? प्रमाद आदिमें पड़ा रहेगा तो सेवा कैसे कर सकेगा सेवा बहुत ऊँचे दर्जेकी चीज है। ऐसे ऊँचे कर्मका भगवान्ने शूद्रके लिये कैसे विधान कियायदि इस शङ्कापर गुणोंकी दृष्टिसे विचार किया जाय तो गीतामें आया है कि सत्त्वगुणवाले ऊँचे लोकोंमें जाते हैं? रजोगुणवाले मरकर पीछे मध्यलोक अर्थात् मृत्युलोकमें जाते हैं और तमोगुणवाले अधोगतिमें जाते हैं (गीता 14। 18)। इसमें भी वास्तवमें न देखा जाय तो रजोगुणके बढ़नेपर जो मरता है? वह कर्मप्रधान मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है -- रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते (गीता 14। 15)। इन सबका तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्यमात्र रजःप्रधान (रजोगुणकी प्रधानतावाला) है। रजःप्रधानवालोंमें जो सात्त्विक? राजस और तामस -- तीन गुण होते हैं? उन तीनों गुणोंसे ही चारों वर्णोंकी रचना की गयी है। इसलिये कर्म करना सबमें मुख्य होता है और इसीको लेकर मनुष्योंको कर्मयोनि कहा गया है तथा गीतामें भी चारों वर्णोंके कर्मोंके लिये स्वभावज कर्म? स्वभावनियत कर्म आदि पद आये हैं। अतः शूद्रका परिचर्या अर्थात् सेवा करना स्वभावज कर्म है? जिसमें उसे परिश्रम नहीं होता।मनुष्यमात्र कर्मयोनि होनेपर भी ब्राह्मण? क्षत्रिय और वैश्यमें विवेकविचारका विशेष तारतम्य रहता है और शुद्धि भी रहती है परन्तु शूद्रमें मोहकी प्रधानता रहनेसे उसमें विवेक बहुत दब जाता है। इस दृष्टिसे शूद्रके सेवाकर्ममें विवेककी प्रधानता न होकर आज्ञापालनकी प्रधानता रहती है -- अग्या सम न सुसाहिब सेवा (मानस 2। 301। 2)। इसलिये चारों वर्णोंकी आज्ञाके अनुसार सेवा करना? सुखसुविधा जुटा देना शूद्रके लिये स्वाभाविक होता है।शुद्रोंके कर्म परिचर्यात्मक अर्थात् सेवास्वरूप होते हैं। उनके शारीरिक? सामाजिक? नागरिक? ग्रामणिक आदि सबकेसब कर्म ठीक तरहसे सम्पन्न होते हैं? जिनसे चारों ही वर्णोंके जीवननिर्वाहके लिये सुखसुविधा? अनुकूलता और आवश्यकताकी पूर्ति होती है।स्वाभाविक कर्मोंका तात्पर्यचेतन जीवात्मा और जड प्रकृति -- दोनोंका स्वभाव भिन्नभिन्न है। चेतन स्वाभाविक ही निर्विकार अर्थात् परिवर्तनरहित है और प्रकृति स्वाभाविक ही विकारी अर्थात् परिवर्तनशील है। अतः इन दोनोंका स्वभाव भिन्नभिन्न होनेसे इनका सम्बन्ध स्वाभाविक नहीं है किंतु चेतनने प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध मानकर उस सम्बन्धकी सद्भावना कर ली है अर्थात् सम्बन्ध है ऐसा मान लिया है। इसीको गुणोंका सङ्ग कहते हैं? जो जीवात्माके अच्छीबुरी योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है -- कारणं गुणसङ्गोस्य सदसद्योनिजन्मसु (गीता 13। 21)। इस सङ्गके कारण? गुणोंके तारतम्यसे जीवका ब्राह्मणादि वर्णमें जन्म होता है। गुणोंके तारतम्यसे जिस वर्णमें जन्म होता है? उन गुणोंके अनुसार ही उस वर्णके कर्म स्वाभाविक? सहज होते हैं जैसे -- ब्राह्मणके लिये शम? दम आदि क्षत्रियके लिये शौर्य? तेज आदि वैश्यके लिये खेती? गौरक्षा आदि और शूद्रके लिये सेवा -- ये कर्म स्वतःस्वाभाविक होते हैं। तात्पर्य है कि चारों वर्णोंको इन कर्मोंको करनेमें परिश्रम नहीं होता क्योंकि गुणोंके अनुसार स्वभाव और स्वभावके अनुसार उनके लिये कर्मोंका विधान है। इसलिये इन कर्मोंमें उनकी स्वाभाविक ही रुचि होती है। मनुष्य इन स्वाभाविक कर्मोंको जब अपने लिये अर्थात् अपने स्वार्थ? भोग और आरामके लिये करता है? तब वह उन कर्मोंसे बँध जाता है। जब उन्हीं कर्मोंको स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके निष्कामभावपूर्वक संसारके हितके लिये करता है? तब कर्मयोग हो जाता है? और उन्हीं कर्मोंसे सब संसारमें व्यापक परमात्माका पूजन करता है अथवा भगवत्परायण होकर केवल भगवत्सम्बन्धी कर्म (जप? ध्यान? सत्सङ्ग? स्वाध्याय आदि) करता है? तब वह भक्तियोग हो जाता है। फिर प्रकृतिके गुणोंका सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जानेपर केवल एक परमात्मतत्त्व ही रह जाता है? जिसमें सिद्ध महापुरुषके स्वरूपकी स्वतःसिद्ध स्वतन्त्रता? अखण्डता? निर्विकारताकी अनुभूति रह जाती है। ऐसा होनेपर भी उसके शरीर? मन? बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा अपनेअपने वर्ण? आश्रमकी मर्यादाके अनुसार निर्लिप्ततापूर्वक शास्त्रविहित कर्म स्वाभाविक होते हैं? जो कि संसारमात्रके लिये आदर्श होते हैं। प्रभुकी तरफ आकृष्ट होनेसे प्रतिक्षण प्रेम बढ़ता रहता है? जो अनन्त आनन्दस्वरूप है।जाति जन्मसे मानी जाय या कर्मसे ऊँचनीच योनियोंमें जितने भी शरीर मिलते हैं? वे सब गुण और कर्मके अनुसार ही मिलते हैं। गुण और कर्मके अनुसार ही मनुष्यका जन्म होता है इसलिये मनुष्यकी जाति जन्मसे ही मानी जाती है। अतः स्थूलशरीरकी दृष्टिसे विवाह? भोजन आदि कर्म जन्मकी प्रधानतासे ही करने चाहिये अर्थात् अपनी जाति या वर्णके अनुसार ही भोजन? विवाह आदि कर्म होने चाहिये।दूसरी बात? जिस प्राणीका सांसारिक भोग? धन? मान? आराम? सुख आदिका उद्देश्य रहता है? उसके लिये वर्णके अनुसार कर्तव्यकर्म करना और वर्णकी मर्यादामें चलना आवश्यक हो जाता है। यदि वह वर्णकी मर्यादामें नहीं चलता? तो उसका पतन हो जाता है (टिप्पणी प0 932)। परन्तु जिसका उद्देश्य केवल परमात्मा ही है? संसारके भोग आदि नहीं? उसके लिये सत्सङ्ग? स्वाध्याय? जप? ध्यान? कथा? कीर्तन? परस्पर विचारविनिमय आदि भगवत्सम्बन्धी काम मुख्य होते हैं। तात्पर्य है कि परमात्माकी प्राप्तिमें प्राणीके पारमार्थिक भाव? आचरण आदिकी मुख्यता है? जाति या वर्णकी नहीं।तीसरी बात? जिसका उद्देश्य परमात्माकी प्राप्तिका है? वह भगवत्सम्बन्धी कार्योंको मुख्यतासे करते हुए भी वर्णआश्रमके अनुसार अपने कर्तव्यकर्मोंको पूजनबुद्धिसे केवल भगवत्प्रीत्यर्थ ही करता है।आगे छियालीसवें श्लोकमें भगवान्ने बड़ी श्रेष्ठ बात बतायी है कि जिससे सम्पूर्ण संसार पैदा हुआ है और जिससे सम्पूर्ण संसार व्याप्त है? उस परमात्माका ही लक्ष्य रखकर? उसके प्रीत्यर्थ ही पूजनरूपसे अपनेअपने वर्णके अनुसार कर्म किये जायँ। इसमें मनुष्यमात्रका अधिकार है। देवता? असुर? पशु? पक्षी आदिका स्वतः अधिकार नहीं है परन्तु उनके लिये भी परमात्माकी तरफसे निषेध नहीं है। कारण कि सभी परमात्माका अंश होनेसे परमात्माकी प्राप्तिके सभी अधिकारी हैं। प्राणिमात्रका भगवान्पर पूरा अधिकार है। इससे भी यह सिद्ध होता है कि आपसके व्यवहारमें अर्थात् रोटी? बेटी और शरीर आदिके साथ बर्ताव करनेमें तो जन्म की प्रधानता है और परमात्माकी प्राप्तिमें भाव? विवेक और कर्म की प्रधानता है। इसी आशयको लेकर भागवतकारने कहा है कि जिस मनुष्यके वर्णको बतानेवाला जो लक्षण कहा गया है? वह यदि दूसरे वर्णवालेमें भी मिले तो उसे भी उसी वर्णका समझ लेना चाहिये (टिप्पणी प0 933.1)। अभिप्राय यह है कि ब्राह्मणके शमदम आदि जितने लक्षण हैं? वे लक्षण या गुण स्वाभाविक ही किसीमें हों तो जन्ममात्रसे नीचा होनेपर भी उसको नीचा नहीं मानना चाहिये। ऐसे ही महाभारतमें युधिष्ठिर और नहुषके संवादमें आया है कि जो शूद्र आचरणोंमें श्रेष्ठ है? उस शूद्रको शूद्र नहीं मानना चाहिये और जो ब्राह्मण ब्राह्मणोचित कर्मोंसे रहित है? उस ब्राह्मणको ब्राह्मण नहीं मानना चाहिये (टिप्पणी प0 933.2) अर्थात् वहाँ कर्मोंकी ही प्रधानता ली गयी है? जन्मकी नहीं।शास्त्रोंमें जो ऐसे वचन आते हैं? उन सबका तात्पर्य है कि कोई भी नीच वर्णवाला साधारणसेसाधारण मनुष्य अपनी पारमार्थिक उन्नति कर सकता है? इसमें संदेहकी कोई बात नहीं है। इतना ही नहीं? वह उसी वर्णमें रहता हुआ शम? दम आदि जो सामान्य धर्म हैं? उनका साङ्गोपाङ्ग पालन करता हुआ अपनी श्रेष्ठताको प्रकट कर सकता है। जन्म तो पूर्वकर्मोंके अनुसार हुआ है? इसमें वह बेचारा क्या कर सकता है परन्तु वहीं (नीच वर्णमें) रहकर भी वह अपनी नयी उन्नति कर सकता है। उस नयी उन्नतिमें प्रोत्साहित करनेके लिये ही शास्त्रवचनोंका आशय मालूम देता है कि नीच वर्णवाला भी नयी उन्नति करनेमें हिम्मत न हारे। जो ऊँचे वर्णवाला होकर भी वर्णोचित काम नहीं करता? उसको भी अपने वर्णोचित काम करनेके लिये शास्त्रोंमें प्रोत्साहित किया है जैसे -- ब्राह्मणस्य हि देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यते।(श्रीमद्भा0 11। 17। 42) जिन ब्राह्मणोंका खानपान? आचरण सर्वथा भ्रष्ट है? उन ब्राह्मणोंका वचनमात्रसे भी आदर नहीं करना चाहिये -- ऐसा स्मृतिमें आया है (मनु0 4। 30। 192)। परन्तु जिनके आचरण श्रेष्ठ हैं? जो भगवान्के भक्त हैं? उन ब्राह्मणोंकी भागवत आदि पुराणोंमें और महाभारत? रामायण आदि इतिहासग्रन्थोंमें बहुत महिमा गायी गयी है।भगवान्का भक्त चाहे कितनी ही नीची जातिका क्यों न हो? वह भक्तिहीन विद्वान् ब्राह्मणसे श्रेष्ठ है (टिप्पणी प0 933.3)।ब्राह्मणको विराट्रूप भगवान्का मुख? क्षत्रियको हाथ? वैश्यको ऊरु (मध्यभाग) और शूद्रको पैर बताया गया है। ब्राह्मणको मुख बतानेका तात्पर्य है कि उनके पास ज्ञानका संग्रह है? इसलिये चारों वर्णोंको पढ़ाना? अच्छी शिक्षा देना और उपदेश सुनाना -- यह मुखका ही काम है। इस दृष्टिसे ब्राह्मण ऊँचे माने गये।क्षत्रियको हाथ बतानेका तात्पर्य है कि वे चारों वर्णोंकी शत्रुओंसे रक्षा करते हैं। रक्षा करना मुख्यरूपसे हाथोंका ही काम है जैसे -- शरीरमें फोड़ाफुंसी आदि हो जाय तो हाथोंसे ही रक्षा की जाती है शरीरपर चोट आती हो तो रक्षाके लिये हाथ ही आड़ देते हैं? और अपनी रक्षाके लिये दूसरोंपर हाथोंसे ही चोट पहुँचायी जाती है आदमी कहीं गिरता है तो पहले हाथ ही टिकते हैं। इसलिये क्षत्रिय हाथ हो गये। अराजकता फैल जानेपर तो जन? धन? आदिकी रक्षा करना चारों वर्णोंका धर्म हो जाता है।वैश्यको मध्यभाग कहनेका तात्पर्य है कि जैसे पेटमें अन्न? जल? औषध आदि डाले जाते हैं तो उनसे शरीरके सम्पूर्ण अवयवोंको खुराक मिलती है और सभी अवयव पुष्ट होते हैं? ऐसे ही वस्तुओंका संग्रह करना? उनका यातायात करना? जहाँ जिस चीजकी कमी हो वहाँ पहुँचाना? प्रजाको किसी चीजका अभाव न होने देना वैश्यका काम है। पेटमें अन्नजलका संग्रह सब शरीरके लिये होता है और साथमें पेटको भी पुष्टि मिल जाती है क्योंकि मनुष्य केवल पेटके लिये पेट नहीं भरता। ऐसे ही वैश्य केवल दूसरोंके लिये ही संग्रह करे? केवल अपने लिये नहीं। वह ब्राह्मण आदिको दान देता है? क्षत्रियोंको टैक्स देता है? अपना पालन करता है और शूद्रोंको मेहनताना देता है। इस प्रकार वह सबका पालन करता है। यदि वह संग्रह नहीं करेगा? कृषि? गौरक्ष्य और वाणिज्य नहीं करेगा तो क्या देगाशूद्रको चरण बतानेका तात्पर्य है कि जैसे चरण सारे शरीरको उठाये फिरते हैं और पूरे शरीरकी सेवा चरणोंसे ही होती है? ऐसे ही सेवाके आधारपर ही चारों वर्ण चलते हैं। शूद्र अपने सेवाकर्मके द्वारा सबके आवश्यक कार्योंकी पूर्ति करता है।उपर्युक्त विवेचनमें एक ध्यान देनेकी बात है कि गीतामें चारों वर्णोंके उन स्वाभाविक कर्मोंका वर्णन है? जो कर्म स्वतः होते हैं अर्थात् उनको करनेमें अधिक परिश्रम नहीं पड़ता। चारों वर्णोंके लिये और भी दूसरे कर्मंका विधान है? उनको स्मृतिग्रन्थोंमें देखना चाहिये और उनके अनुसार अपने आचरण बनाने चाहिये (गीता 16। 24)।वर्तमानमें चारों वर्णोंमें गड़बड़ी आ जानेपर भी यदि चारों वर्णोंके समुदायोंको इकट्ठा करके अलगअलग समुदायमें देखा जाय तो ब्राह्मणसमुदायमें शम? दम आदि गुण जितने अधिक मिलेंगे? उतने क्षत्रिय? वैश्य और शूद्रसमुदायमें नहीं मिलेंगे। क्षत्रियसमुदायमें शौर्य? तेज आदि गुण जितने अधिक मिलेंगे? उतने ब्राह्मण? वैश्य और शूद्रसमुदायमें नहीं मिलेंगे। वैश्यसमुदायमें व्यापार करना? धनका उपार्जन करना? धनको पचाना (धनका भभका ऊपरसे न दीखने देना) आदि गुण जितने अधिक मिलेंगे? उतने ब्राह्मण? क्षत्रिय और शूद्रसमुदायमें नहीं मिलेंगे। शूद्रसमुदायमें सेवा करनेकी प्रवृत्ति जितनी अधिक मिलेगी? उतनी ब्राह्मण? क्षत्रिय और वैश्यसमुदायमें नहीं मिलेगी। तात्पर्य यह है कि आज सभी वर्ण मर्यादारहित और उच्छृङ्खल होनेपर भी उनके स्वभावज कर्म उनके समुदायोंमें विशेषतासे देखनेमें आते हैं अर्थात् यह चीज व्यक्तिगत न,दीखकर समुदायगत देखनेमें आती है।जो लोग शास्त्रके गहरे रहस्यको नहीं जानते? वे कह देते हैं कि ब्राह्मणोंके हाथमें कलम रही? इसलिये उन्होंने ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ है ऐसा लिखकर ब्राह्मणोंको सर्वोच्च कह दिया। जिनके पास राज्य था? उन्होंने ब्राह्मणोंसे कहा -- क्यों महाराज हमलोग कुछ नहीं हैं क्या तो ब्राह्मणोंने कह दिया -- नहींनहीं? ऐसी बात नहीं। आपलोग भी हैं? आपलोग दो नम्बरमें हैं। वैश्योंने ब्राह्मणोंसे कहा -- क्यों महाराज हमारे बिना कैसे जीविका चलेगी आपकी ब्राह्मणोंने कहा -- हाँ? हाँ? आपलोग तीसरे नम्बरमें हैं। जिनके पास न राज्य था? न धन था? वे ऊँचे उठने लगे तो ब्राह्मणोंने कह दिया -- आपके भाग्यमें राज्य और धन लिखा नहीं है। आपलोग तो इन ब्राह्मणों? क्षत्रियों और वैश्योंकी सेवा करो। इसलिये चौथे नम्बरमें आप लोग हैं। इस तरह सबको भुलावेमें डालकर विद्या? राज्य और धनके प्रभावसे अपनी एकता करके चौथे वर्णको पददलित कर दिया -- यह लिखनेवालोंका अपना स्वार्थ और अभिमान ही है।इसका समाधान यह है कि ब्राह्मणोंने कहीं भी अपने ब्राह्मणधर्मके लिये ऐसा नहीं लिखा है कि ब्राह्मण सर्वोपरि हैं? इसलिये उनको बड़े आरामसे रहना चाहिये? धनसम्पत्तिसे युक्त होकर मौज करनी चाहिये इत्यादि? प्रत्युत ब्राह्मणोंके लिये ऐसा लिखा है कि उनको त्याग करना चाहिये? कष्ट सहना चाहिये तपश्चर्या करनी चाहिये। गृहस्थमें रहते हुए भी उनको धनसंग्रह नहीं करना चाहिये? अन्नका संग्रह भी थोड़ा ही होना चाहिये -- कुम्भीधान्य अर्थात् एक घड़ा भरा हुआ अनाज हो? लौकिक भोगोंमें आसक्ति नहीं होनी चाहिये? और जीवननिर्वाहके लिये किसीसे दान भी लिया जाय तो उसका काम करके अर्थात् यज्ञ? होम? जप? पाठ आदि करके ही लेना चाहिये। गोदान आदि लिया जाय तो उसका प्रायश्चित्त करना चाहिये।यदि कोई ब्राह्मणको श्राद्धका निमन्त्रण देना चाहे तो वह श्राद्धके पहले दिन दे? जिससे ब्राह्मण उसके पितरोंका अपनेमें आवाहन करके रात्रिमें ब्रह्मचर्य और संयमपूर्वक रह सके। दूसरे दिन वह यजमानके पितरोंका पिण्डदान? तर्पण ठीक विधिविधानसे करवाये। उसके बाद वहाँ भोजन करे। निमन्त्रण भी एक ही यजमानका स्वीकार करे और भोजन भी एक ही घरका करे। श्राद्धका अन्न खानेके बाद गायत्रीजप आदि करके शुद्ध होना चाहिये। दान लेना? श्राद्धका भोजन करना ब्राह्मणके लिये ऊँचा दर्जा नहीं है। ब्राह्मणका ऊँचा दर्जा त्यागमें है। वे केवल यजमानके पितरोंका कल्याण भावनासे ही श्राद्धका भोजन और दक्षिणा स्वीकार करते हैं? स्वार्थकी भावनासे नहीं अतः यह भी उनका त्याग ही है।ब्राह्मणोंने अपनी जीविकाके लिये ऋत? अमृत? मृत? सत्यानृत और प्रमृत -- ये पाँच वृत्तियाँ बतायी हैं (टिप्पणी प0 935.1) --,(1) ऋतवृत्ति सर्वोच्च वृत्ति मानी गयी है। इसको शिलोञ्छ या कपोतवृत्ति भी कहते हैं। खेती करनेवाले खेतमेंसे धान काटकर ले जायँ? उसके बाद वहाँ जो अन्न (ऊमी? सिट्टा आदि) पृथ्वीपर गिरा पड़ा हो? वह भूदेवों (ब्राह्मणों) का होता है अतः उनको चुनकर अपना निर्वाह करना शिलोञ्छवृत्ति है अथवा धान्यमण्डीमें जहाँ धान्य तौला जाता है? वहाँ पृथ्वीपर गिरे हुए दाने भूदेवोंके होते हैं अतः उनको चुनकर जीवननिर्वाह करना कपोतवृत्ति है।(2) बिना याचना किये और बिना इशारा किये कोई यजमान आकर देता है तो निर्वाहमात्रकी वस्तु लेना अमृतवृत्ति है। इसको अयाचितवृत्ति भी कहते हैं।(3) सुबह भिक्षाके लिये गाँवमें जाना और लोगोंको वार? तिथि? मुहूर्त आदि बताकर (इस रूपमें काम करके) भिक्षामें जो कुछ मिल जाय? उसीसे अपना जीवननिर्वाह करना मृतवृत्ति है।(4) व्यापार करके जीवननिर्वाह करना सत्यानृतवृत्ति है।(5) उपर्युक्त चारों वृत्तियोंसे जीवननिर्वाह न हो तो खेती करे? पर वह भी कठोर विधिविधानसे करे जैसे -- एक बैलसे हल न चलाये? धूपके समय हल न चलाये आदि? यह प्रमृतवृत्ति है।उपर्युक्त वृत्तियोंमेंसे किसी भी वृत्तिसे निर्वाह किया जाय? उसमें पञ्चमहायज्ञ? अतिथिसेवा करके यज्ञशेष भोजन करना चाहिये (टिप्पणी प0 935.2)।श्रीमद्भगवद्गीतापर विचार करते हैं तो ब्राह्मणके लिये पालनीय जो नौ स्वाभाविक धर्म बताये गये हैं? उनमें जीविका पैदा करनेवाला एक भी धर्म नहीं है। क्षत्रियके लिये सात स्वाभाविक धर्म बताये हैं। उनमें युद्ध करना और शासन करना -- ये दो धर्म कुछ जीविका पैदा करनेवाले हैं। वैश्यके लिये तीन धर्म बताये हैं -- खेती? गोरक्षा और व्यापार ये तीनों ही जीविका पैदा करनेवाले हैं। शूद्रके लिये एक सेवा ही धर्म बताया है? जिसमें पैदाहीपैदा होती है। शूद्रके लिये खानपान? जीवननिर्वाह आदिमें भी बहुत छूट दी गयी है।भगवान्ने स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः (गीता 18। 45) पदोंसे कितनी विचित्र बात बतायी है कि शम? दम आदि नौ धर्मोंके पालनसे ब्राह्मणका जो कल्याण होता है? वही कल्याण शौर्य? तेज आदि सात धर्मोंके पालनसे क्षत्रियका होता है? वही कल्याण खेती? गोरक्षा और व्यापारके पालनसे वैश्य होता है और वही कल्याण केवल सेवा करनेसे शूद्रका हो जाता है।आगे भगवान्ने एक विलक्षण बात बतायी है कि ब्राह्मण? क्षत्रिय? वैश्य और शूद्र अपनेअपने वर्णोचित कर्मोंके द्वारा उस परमात्माका पूजन करके परम सिद्धिको प्राप्त हो जाते हैं -- स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः (18। 46)। वास्तवमें कल्याण वर्णोचित कर्मोंसे नहीं होता? प्रत्युत निष्कामभावपूर्वक पूजनसे ही होता है। शूद्रका तो स्वाभाविक कर्म ही परिचर्यात्मक अर्थात् पूजनरूप है अतः उसका पूजनके द्वारा पूजन होता है अर्थात् उसके द्वारा दुगुनी पूजा होती है इसलिये उसका कल्याण जितनी जल्दी होगा? उतनी जल्दी ब्राह्मण आदिका नहीं होगा।शास्त्रकारोंने उद्धार करनेमें छोटेको ज्यादा प्यार दिया है क्योंकि छोटा प्यारका पात्र होता है और बड़ा अधिकारका पात्र होता है। बड़ेपर चिन्ताफिक्र ज्यादा रहती है? छोटेपर कुछ भी भार नहीं रहता। शूद्रको भाररहित करके उसकी जीविका बतायी गयी है और प्यार भी दिया गया है।वास्तवमें देखा जाय तो जो वर्णआश्रममें जितना ऊँचा होता है? उसके लिये शास्त्रोंके अनुसार उतने ही कठिन नियम होते हैं। उन नियमोंका साङ्गोपाङ्ग पालन करनेमें कठिनता अधिक मालूम देती है। परन्तु जो वर्णआश्रममें नीचा होता है? उसका कल्याण सुगमतासे हो जाता है। इस विषयमें विष्णुपुराणमें एक कथा आती है -- एक बार बहुतसे ऋषिमुनि मिलकर श्रेष्ठताका निर्णय करनेके लिये भगवान् वेदव्यासजीके पास गये। व्यासजीने सबको आदरपूर्वक बिठाया और स्वयं गङ्गामें स्नान करने चले गये। गङ्गामें स्नान करते हुए उन्होंने कहा -- कलियुग? तुम धन्य हो स्त्रियों? तुम धन्य हो शूद्रों? तुम धन्य हो जब व्यासजी स्नान करके ऋषियोंके पास आये तो ऋषियोंने कहा -- महाराज आपने कलियुग? स्त्रियों और शूद्रोंको धन्यवाद कैसे दिया तो उन्होंने कहा कि कलियुगमें अपने धर्मका पालन करनेसे स्त्रियाँ और शूद्रोंका कल्याण जल्दी और सुगमतापूर्वक हो जाता है।यहाँ एक और बात सोचनेकी है कि जो अपने स्वार्थका काम करता है? वह समाजमें और संसारमें आदरका पात्र नहीं होता। समाजमें ही नहीं? घरमें भी जो व्यक्ति पेटू और चट्टू होता है? उसकी दूसरे निन्दा करते हैं। ब्राह्मणोंने स्वार्थदृष्टिसे अपने ही मुँहसे अपनी (ब्राह्मणोंकी) प्रशंसा? श्रेष्ठताकी बात नहीं कही है। उन्होंने,ब्राह्मणोंके लिये त्याग ही बताया है। सात्त्विक मनुष्य अपनी प्रशंसा नहीं करते? प्रत्युत दूसरोंकी प्रशंसा? दूसरोंका आदर करते हैं। तात्पर्य है कि ब्राह्मणोंने कभी अपने स्वार्थ और अभिमानकी बात नहीं कही। यदि वे स्वार्थ और अभिमानकी बात कहते तो वे इतने आदरणीय नहीं होते? संसारमें और शास्त्रोंमें आदर न पाते। वे जो आदर पाते हैं? वह त्यागसे ही पाते हैं।इस प्रकार मनुष्यको शास्त्रोंका गहरा अध्ययन करके उपर्युक्त सभी बातोंको समझना चाहिये और ऋषिमुनियोंपर? शास्त्रकारोंपर झूठा आक्षेप नहीं करना चाहिये।ऊँचनीच वर्णोंमें प्राणियोंका जन्म मुख्यरूपसे गुणों और कर्मोंके अनुसार होता है -- चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः (गीता 4। 13) परन्तु ऋणानुबन्ध? शाप? वरदान? सङ्ग आदि किसी कारणविशेषसे भी ऊँचनीच वर्णोंमें जन्म हो जाता है। उन वर्णोंमें जन्म होनेपर भी वे अपने पूर्वस्वभावके अनुसार ही आचरण करते हैं। यही कारण है कि ऊँचे वर्णमें उत्पन्न होनेपर भी उनके नीच आचरण देखे जाते हैं? जैसे धुन्धुकारी आदि और नीच वर्णमें उत्पन्न होनेपर भी वे महापुरुष होते हैं? जैसे विदुर? कबीर? रैदास आदि।आज जिस समुदायमें जातिगत? कुलपरम्परागत? समाजगत और व्यक्तिगत जो भी शास्त्रविपरीत दोष आये हैं? उनको अपने विवेकविचार? सत्सङ्ग? स्वाध्याय आदिके द्वारा दूर करके अपनेमें स्वच्छता? निर्मलता? पवित्रता लानी चाहिये? जिससे अपने मनुष्यजन्मका ध्येय सिद्ध हो सके। सम्बन्ध --   स्वभावज कर्मोंका वर्णन करनेका प्रयोजन क्या है -- इसको अब आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।

हिंदी टीका - स्वामी चिन्मयानंद जी

।।18.44।। प्रत्येक मनुष्य में गुणों की तारतम्यता किसी विशिष्ट अनुपात में होती है और इसलिए प्रत्येक मनुष्य का अपना विशिष्ट स्वभाव भी होता है। इसी कारण एक मनुष्य जिस कार्य विशेष को कुशलतापूर्वक कर सकता है? उसी कार्य को अन्य व्यक्ति उतनी कुशलता से नहीं कर पाता। रजोगुणी क्षत्रिय को सात्त्विक ब्राह्मण के समान ध्यानाभ्यास करना संभव नहीं होता। उसी प्रकार वैश्य और शूद्र भी क्षत्रिय के शूरवीरतापूर्ण कर्मों को नहीं कर पायेंगे। सामाजिक जीवन में सर्वोच्च प्रतिष्ठा के पद तक पहुँचने के लिए सभी मनुष्यों को पूर्णत एकरूप अवसर प्राप्त नहीं हो सकते। तथापि? एक सामाजिक व्यवस्था सभी मनुष्यों को अपनेअपने स्वभाव के अनुसार विकसित हाेने के लिए तुल्य अवसर प्रदान कर सकती है। इस सिद्धांत या व्यवस्था को सफल बनाने हेतु विभिन्न व्यक्तित्व (वर्णों) के मनुष्यों के लिए भिन्नभिन्न कर्तव्यों का विधान किया गया है।वैश्य वृत्ति का पुरुष कृषि? गौपालन तथा वाणिज्य के क्षेत्र में स्फूर्ति और प्रेरणा से कार्य करके अपने दोषों से मुक्त हो सकता है। दोषमुक्ति से तात्पर्य वासनाक्षय से है। वाणिज्यादि कर्मों में उसकी स्वाभाविक अभिरुचि होती है। उसी प्रकार अर्पण की भावना से सबकी सेवा करना शूद्र का स्वाभाविक कर्म है।प्रत्येक मनुष्य के आन्तरिक स्वभाव के अनुसार उसका वर्ण और कर्म निर्धारित किया जा सकता है। अपने स्वभाव के विपरीत कर्म में नियुक्त किये जाने पर मनुष्य न केवल उस कर्म क्षेत्र में दुर्व्यवस्था उत्पन्न करता है? वरन् अपनी स्वयं की भी हानि कर लेता है। उदाहरणार्थ यदि किसी क्षत्रिय से कहा जाये कि वह सेवाभाव पूर्वक पंखा झलने का कार्य करे? तो वह सम्भवत विनम्रता से उसे स्वीकार कर लेगा परन्तु तत्काल ही अपने स्वभाववश किसी दूसरे व्यक्ति को पंखा लाने की आज्ञा देगा इसी प्रकार यदि किसी वैश्य को मन्दिर का पुजारी बना दिया जाये? तो वह पवित्र स्थान? शीघ्र ही? किसी व्यापारिक केन्द्र से भी निम्न स्तर का बन जायेगा और यदि उसके हाथों में राजसत्ता सौंप दी जाये? तो वह अपने स्वभाव से विवश उस प्राप्त अधिकार द्वारा लाभदायक व्यापार करना प्रारम्भ कर देगा जनता इसे ही भ्रष्टाचार कहती है हम सबको आत्मनिरीक्षण के द्वारा अपना वर्ण और कर्म निर्धारित करना चाहिए। किसी भी उच्चवर्गीय पुरुष को निम्नवर्णीय मनुष्यों की ओर अनादर भाव से देखने का अधिकार नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति यथाशक्ति समाज की सेवा करता है। ईश्वरार्पण की भावना से समाज की सेवा करते हुए प्रत्येक मनुष्य को आत्मविकास तथा पूर्णत्व प्राप्ति के लिए साधनारत रहना चाहिए।इसी विषय में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं