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Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 14

भगवद् गीता अध्याय 13 श्लोक 14

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति।।13.14।।

हिंदी अनुवाद - स्वामी रामसुख दास जी ( भगवद् गीता 13.14)

।।13.14।।वे (परमात्मा) सब जगह हाथों और पैरोंवाले? सब जगह नेत्रों? सिरों और मुखोंवाले तथा सब,जगह कानोंवाले हैं। वे संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित हैं।

हिंदी अनुवाद - स्वामी तेजोमयानंद

।।13.14।। वह सब ओर हाथपैर वाला है और सब ओर से नेत्र? शिर और मुखवाला तथा सब ओर से श्रोत्रवाला है वह जगत् में सबको व्याप्त करके स्थित है।।

हिंदी टीका - स्वामी रामसुख दास जी

।।13.14।। व्याख्या --   सर्वतः पाणिपादं तत् -- जैसे स्याहीमें सब जगह सब तरहकी लिपियाँ विद्यमान हैं अतः लेखक स्याहीसे सब तरहकी लिपियाँ लिख सकता है। सोनेमें सब जगह सब तरहके गहने विद्यमान हैं अतः सुनार सोनेमें किसी भी जगहसे जो गहना बनाना चाहे? बना सकता है। ऐसे ही भगवान्के सब जगह ही हाथ और पैर हैं अतः भक्त भक्तिसे जहाँकहीं जो कुछ भी भगवान्के हाथोंमें देना चाहता है? अर्पण करना चाहता है? उसको ग्रहण करनेके लिये उसी जगह भगवान्के हाथ मौजूद हैं। भक्त बाहरसे अर्पण करना चाहे अथवा मनसे? पूर्वमें देना चाहे अथवा पश्चिममें? उत्तरमें देना चाहे अथवा दक्षिणमें? उसे ग्रहण करनेके लिये वहीं भगवान्के हाथ मौजूद हैं। ऐसे ही भक्त जलमें? स्थलमें? अग्निमें? जहाँकहीं जिस किसी भी संकटमें पड़नेपर भगवान्को पुकारता है? उसकी रक्षा करनेके लिये वहाँ ही भगवान्के हाथ तैयार हैं अर्थात् भगवान् वहाँ ही अपने हाथोंसे उसकी रक्षा करते हैं।भक्त जहाँकहीं भगवान्के चरणोंमें चन्दन लगाना चाहता है? पुष्प चढ़ाना चाहता है? नमस्कार करना चाहता है? उसी जगह भगवान्के चरण मौजूद हैं। हजारोंलाखों भक्त एक ही समयमें भगवान्के चरणोंकी अलगअलग पूजा करना चाहें? तो उनके भावके अनुसार वहाँ ही भगवान्के चरण मौजूद हैं।सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् -- भक्त भगवान्को जहाँ दीपक दिखाता है? आरती करता है? वहाँ ही भगवान्के नेत्र हैं। भक्त जहाँ शरीरसे अथवा मनसे नृत्य करता है? वहाँ ही भगवान् उसके नृत्यको देख लेते हैं। तात्पर्य है कि जो भगवान्को सब जगह देखता है? भगवान् भी उसकी दृष्टिसे कभी ओझल नहीं होते (गीता 6। 30)।भक्त जहाँ भगवान्के मस्तकपर चन्दन लगाना चाहे? पुष्प चढ़ाने चाहे? वहाँ ही भगवान्का मस्तक है।भक्त जहाँ भगवान्को भोग लगाना चाहे? वहाँ ही भगवान्का मुख है अर्थात् भक्तद्वारा भक्तिपूर्वक दिये हुए पदार्थको भगवान् वहाँ ही खा लेते हैं (गीता 9। 26)।सर्वतःश्रुतिमत् -- भक्त जहाँकहीं जोरसे बोलकर प्रार्थना करे? धीरेसे बोलकर प्रार्थना करे अथवा मनसे प्रार्थना करे? वहाँ ही भगवान् अपने कानोंसे सुन लेते हैं।मनुष्योंके सब अवयव (अङ्ग) सब जगह नहीं होते अर्थात् जहाँ नेत्र हैं? वहाँ कान नहीं होते और जहाँ कान,हैं? वहाँ नेत्र नहीं होते जहाँ हाथ हैं? वहाँ पैर नहीं होते और जहाँ पैर हैं? वहाँ हाथ नहीं होते इत्यादि। परन्तु भगवान्की इन्द्रियाँ? उनके अवयव सब जगह हैं। अतः भगवान् नेत्रोंसे सुन भी सकते हैं? बोल भी सकते हैं? ग्रहण भी कर सकते हैं इत्यादि। तात्पर्य है कि वे सभी अवयवोंसे सभी क्रियाएँ कर सकते हैं क्योंकि उनके सभी अवयवोंमें सभी अवयव मौजूद हैं। उनके छोटेसेछोटे अंशमें भी सबकीसब इन्द्रियाँ हैं।भगवान्के सब जगह हाथ? पैर? नेत्र? सिर? मुख और कान कहनेका तात्पर्य है कि भगवान् किसी भी प्राणीसे दूर नहीं हैं। कारण कि भगवान् सम्पूर्ण देश? काल? वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति आदिमें परिपूर्णरूपसे विद्यमान हैं। संतोंने कहा है -- चहुँ दिसि आरति चहुँ दिसि पूजा। चहुँ दिसि राम और नहिं दूजा।।संसारी आदमीको जैसे बाहरभीतर? ऊपरनीचे सब जगह संसारहीसंसार दीखता है? संसारके सिवाय दूसरा कुछ दीखता ही नहीं? ऐसे ही परमात्माको तत्त्वसे जाननेवाले पुरुषको सब जगह परमात्माहीपरमात्मा दीखते हैं।लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति -- अनन्त सृष्टियाँ हैं? अनन्त ब्रह्माण्ड हैं? अनन्त ऐश्वर्य हैं और उन सबमें देश? काल? वस्तु? व्यक्ति आदि भी अनन्त हैं? वे सभी परमात्माके अन्तर्गत हैं। परमात्मा उन सबको व्याप्त करके स्थित हैं। दसवें अध्यायके बयालीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने कहा है कि मैं सारे संसारको एक अंशसे व्याप्त करके स्थित हूँ। सम्बन्ध --   पूर्वश्लोकमें सगुणनिराकारका वर्णन करके अब आगेके तीन श्लोकोंमें उसकी विलक्षणता? सर्वव्यापकता और सर्वसमर्थताका वर्णन करते हैं।

हिंदी टीका - स्वामी चिन्मयानंद जी

।।13.14।। सर्वत पाणिपादम् उत्तम अधिकारी तो आत्मा के निर्गुण स्वरूप को पहचान लेता है? परन्तु मध्यम अधिकारी को अज्ञात और अव्यक्त का बोध? ज्ञात और व्यक्त वस्तुओं के द्वारा कराने में सरलता होती है। यद्यपि प्रणियों के हाथ और पैर जड़ तत्त्व के बने हैं? तथापि वे चेतन और कार्यक्षम प्रतीत हो रहे हैं। इन सबके पीछे इन्हें चेतनता प्रदान करने वाला आत्मतत्त्व सर्वत्र एक ही है। इसीलिए यहाँ कहा गया है कि ब्रह्म समस्त हाथ और पैरों को धारण करने वाला है।इसी प्रकार? समस्त नेत्र? शिर और मुख भी इस चैतन्य के कारण ही स्वव्यापार करने में समर्थ होते हैं। इसलिए आत्मा का निर्देश इस प्रकार करते हैं कि वह सब ओर नेत्र? शिर और मुख वाला है। चैतन्य से धारण किये होने पर ही प्राणियों में विषय ग्रहण तथा विचार करने की क्रियाएं होती रहती हैं। अत चैतन्य ब्रह्म सब ओर से श्रोत वाला कहा गया है।यह सबको व्याप्त करके स्थित है यहाँ जब आत्मा के उपाधियुक्त स्वरूप और प्रभाव को दर्शाया गया है? तो कोई यह मान सकता है कि जहाँ उपाधियाँ हैं? वहीं पर आत्मा का अस्तित्व है और अन्यत्र नहीं। इस प्रकार की विपरीत धारणा को दूर करने के लिए यहाँ पर अत्यन्त उचित ही कहा गया है कि वह परम सत्य सबको व्याप्त करके स्थित है। यह श्लोक वैदिक साहित्य से परिचित विद्यार्थियों को ऋग्वेद के प्रसिद्ध पुरुषसूक्तम् का स्मरण कराता है।भगवान् आगे कहते हैं