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Bhagavad Gita Chapter 11 Verse 14

भगवद् गीता अध्याय 11 श्लोक 14

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत।।11.14।।

हिंदी अनुवाद - स्वामी रामसुख दास जी ( भगवद् गीता 11.14)

।।11.14।।भगवान्के विश्वरूपको देखकर अर्जुन बहुत चकित हुए और आश्चर्यके कारण उनका शरीर रोमाञ्चित हो गया। वे हाथ जोड़कर विश्वरूप देवको मस्तकसे प्रणाम करके बोले।

हिंदी अनुवाद - स्वामी तेजोमयानंद

।।11.14।। उसके उपरान्त वह आश्चर्यचकित हुआ हर्षित रोमों वाला (जिसे रोमांच का अनुभव हो रहा हो) धनंजय अर्जुन विश्वरूप देव को (श्रद्धा भक्ति सहित) शिर से प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोला।।

हिंदी टीका - स्वामी रामसुख दास जी

।।11.14।। व्याख्या --  ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः -- अर्जुनने भगवान्के रूपके विषयमें जैसी कल्पना भी नहीं की थी? वैसा रूप देखकर उनको बड़ा आश्चर्य हुआ। भगवान्ने मेरेपर कृपा करके विलक्षण आध्यात्मिक बातें अपनी ओरसे बतायीं और अब कृपा करके मेरेको अपना विलक्षण रूप दिखा रहे हैं -- इस बातको लेकर अर्जुन प्रसन्नताके कारण रोमाञ्चित हो उठे।प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत -- भगवान्की विलक्षण कृपाको देखकर अर्जुनका ऐसा भाव उमड़ा कि मैं इसके बदलेमें क्या कृतज्ञता प्रकट करूँ मेरे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं है? जो मैं इनके अर्पण करूँ। मैं तो केवल सिरसे प्रणाम ही कर सकता हूँ अर्थात् अपनेआपको अर्पित ही कर सकता हूँ। अतः अर्जुन हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए विश्वरूप भगवान्की स्तुति करने लगे। सम्बन्ध --   अर्जुन विराट्रूप भगवान्की जिस विलक्षणताको देखकर चकित हुए? उसका वर्णन आगेके तीन श्लोकोंमें करते हुए भगवान्की स्तुति करते हैं।

हिंदी टीका - स्वामी चिन्मयानंद जी

।।11.14।। इस सर्वोत्कृष्ट भव्य दृश्य को देखकर अर्जुन के मन में विस्मय की भावना और शरीर पर हो रहे रोमांच स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। यद्यपि संजय घटनास्थल से दूर है? फिर भी अपनी दिव्य दृष्टि से न केवल समस्त योद्धाओं के शरीर ही? वरन् उनकी मनस्थिति को भी जानने में सक्षम प्रतीत होता है। अर्जुन की विस्मय की भावना उसे उतनी ही स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही है? जितने कि उसके रोमांच। शिर से प्रणाम करते हुये दोनों हाथ जोड़कर अर्जुन कुछ कहने के लिए अपना मुख खोलता है। अब तक अर्जुन कुछ नहीं बोला था? जो उसके कण्ठावरोध का स्पष्ट सूचक है। प्रथम बार जब उसने उस दृश्य को देखा? जो मधुरतापूर्वक साहस तोड़ने वाला प्रतीत होता था? तब भावावेश के कारण अर्जुन का कण्ठ अवरुद्ध हो गया था।