Share this page on following platforms.
Download Bhagwad Gita 10.33 Download BG 10.33 as Image

⮪ BG 10.32 Bhagwad Gita Swami Ramsukhdas Ji BG 10.34⮫

Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 33

भगवद् गीता अध्याय 10 श्लोक 33

अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च।
अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः।।10.33।।

हिंदी अनुवाद - स्वामी रामसुख दास जी ( भगवद् गीता 10.33)

।।10.33।।अक्षरोंमें अकार और समासोंमें द्वन्द्व समास मैं हूँ। अक्षयकाल अर्थात् कालका भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला धाता भी मैं हूँ।

हिंदी टीका - स्वामी रामसुख दास जी

।।10.33।। व्याख्या --   अक्षराणामकारोऽस्मि -- वर्णमालामें सर्वप्रथम अकार आता है। स्वर और व्यञ्जन -- दोनोंमें अकार मुख्य है। अकारके बिना व्यञ्जनोंका उच्चारण नहीं होता। इसलिये अकारको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।द्वन्द्वः सामासिकस्य च -- जिससे दो या दोसे अधिक शब्दोंको मिलाकर एक शब्द बनता है? उसको समसा कहते हैं। समास कई तरहके होते हैं। उनमें अव्ययीभाव? तत्पुरुष? बहुब्रीहि और द्वन्द्व -- ये चार मुख्य हैं। दो शब्दोंके समासमें यदि पहला शब्द प्रधानता रखता है तो वह अव्ययीभाव समास होता है। यदि आगेका शब्द प्रधानता रखता है तो वह तत्पुरुष समास होता है। यदि दोनों शब्द अन्यके वाचक होते हैं तो वह बहुब्रीहि समास होता है। यदि दोनों शब्द प्रधानता रखते हैं तो वह द्वन्द्व समास होता है।द्वन्द्व समासमें दोनों शब्दोंका अर्थ मुख्य होनेसे भगवान्ने इसको अपनी विभूति बताया है।अहमेवाक्षयः कालः -- जिस कालका कभी क्षय नहीं होता अर्थात् जो कालातीत है और अनादिअनन्तरूप है? वह काल भगवान् ही हैं।सर्ग और प्रलयकी गणना तो सूर्यसे होती है? पर महाप्रलयमें जब सूर्य भी लीन हो जाता है? तब समयकी गणना परमात्मासे ही होती है (टिप्पणी प0 563)। इसलिये परमात्मा अक्षय काल है।तीसवें श्लोकके कालः कलयतामहम् पदोंमें आये कालमें और यहाँ आये अक्षय कालमें क्या अन्तर है वहाँका जो काल है? वह एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता? बदलता रहता है। वह काल ज्योतिषशास्त्रका आधार है और उसीसे संसारमात्रके समयकी गणना होती है। परन्तु यहाँका जो अक्षय काल है? वह परमात्मस्वरूप होनेसे कभी बदलता नहीं। वह अक्षय काल सबको खा जाता है और स्वयं ज्योंकात्यों ही रहता है अर्थात् इसमें कभी कोई विकार नहीं होता। उसी अक्षय कालको यहाँ भगवान्ने अपनी विभूति बताया है। आगे ग्यारहवें अध्यायमें भी भगवान्ने कालोऽस्मि (11। 32) पदसे अक्षय कालको अपना स्वरूप बताया है।धाताहं विश्वतोमुखः -- सब ओर मुखवाले होनेसे भगवान्की दृष्टि सभी प्राणियोंपर रहती है। अतः सबका धारणपोषण करनेमें भगवान् बहुत सावधान रहते हैं। किस प्राणीको कौनसी वस्तु कब मिलनी चाहिये? इसका भगवान् खूब खयाल रखते हैं और समयपर उस वस्तुको पहुँचा देते हैं। इसलिये भगवान्ने अपना विभूतिरूपसे वर्णन किया है।