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Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 3

भगवद् गीता अध्याय 10 श्लोक 3

यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते।।10.3।।

हिंदी अनुवाद - स्वामी रामसुख दास जी ( भगवद् गीता 10.3)

।।10.3।।जो मनुष्य मुझे अजन्मा? अनादि और सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर जानता है अर्थात् दृढ़तासे मानता है? वह मनुष्योंमें असम्मूढ़ (जानकार) है और वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है।

हिंदी टीका - स्वामी रामसुख दास जी

।।10.3।। व्याख्या --   यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् -- पीछेके श्लोकमें भगवान्के प्रकट होनेको जाननेका विषय नहीं बताया है। इस विषयको तो मनुष्य भी नहीं जानता? पर जितना जाननेसे मनुष्य अपना कल्याण कर ले? उतना तो वह जान ही सकता है। वह जानना अर्थात् मानना यह है कि भगवान् अज अर्थात् जन्मरहित हैं। वे अनादि हैं अर्थात् यह जो काल कहा जाता है? जिसमें आदिअनादि शब्दोंका प्रयोग होता है? भगवान् उस कालके भी काल हैं। उन कालातीत भगवान्में कालका भी आदि और अन्त हो जाता है। भगवान् सम्पूर्ण लोकोंके महान् ईश्वर हैं अर्थात् स्वर्ग? पृथ्वी और पातालरूप जो त्रिलोकी है तथा उस त्रिलोकीमें जितने प्राणी हैं और उन प्राणियोंपर शासन करनेवाले (अलगअलग अधिकारप्राप्त) जितने ईश्वर (मालिक) हैं? उन सब ईश्वरोंके भी महान् ईश्वर भगवान् हैं। इस प्रकार जाननेसे अर्थात् श्रद्धाविश्वासपूर्वक दृढ़तासे माननेसे मनुष्यको भगवान्के अज? अविनाशी और लोकमहेश्वर होनेमें कभी किञ्चिन्मात्र भी सन्देह नहीं होता।असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते -- भगवान्को अज? अविनाशी और लोकमहेश्वर जाननेसे मनुष्य पापोंसे मुक्त कैसे होगा भगवान् जन्मरहित हैं? नाशरहित हैं अर्थात् उनमें कभी किञ्चिन्मात्र भी परिवर्तन नहीं होता। वे अजन्मा तथा अविनाशी रहते हुए भी सबके महान् ईश्वर हैं। वे सब देशमें रहनेके नाते यहाँ भी हैं? सब समयमें होनेके नाते अभी भी हैं? सबके होनेके नाते मेरे भी हैं और सबके मालिक होनेके नाते मेरे अकेलेके भी मालिक हैं -- इस प्रकार दृढ़तासे मान ले। इसमें सन्देहकी गन्ध भी न रहे। साथहीसाथ? यह जो क्षणभङ्गुर संसार है? जिसका प्रतिक्षण परिवर्तन हो रहा है और जिसको जिस क्षणमें जिस रूपमें देखा है? उसको दूसरे क्षणमें उस रूपमें दुबारा कोई भी देख नहीं सकता क्योंकि वह दूसरे क्षणमें वैसा रहता ही नहीं -- इस प्रकार संसारको यथार्थरूपसे जान ले। जिसने अपनेसहित सारे संसारके मालिक भगवान्को दृढ़तासे मान लिया है और संसारकी क्षणभङ्गुरताको तत्त्वसे ठीक जान लिया है? उसका संसारमें मैं और मेरापन रह ही नहीं सकता प्रत्युत एकमात्र भगवान्में ही अपनापन हो जाता है। तो फिर वह पापोंसे मुक्त नहीं होगा? तो और क्या होगा ऐसा मूढ़तारहित मनुष्य ही भगवान्को तत्त्वसे अज? अविनाशी और लोकमहेश्वर जानता है और वही सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। उसके क्रियमाण? संचित आदि सम्पूर्ण कर्म नष्ट हो जाते हैं। मनुष्यको इस वास्तविकताका अनुभव करनेकी आवश्यकता है? केवल तोतेकी तरह सीखनेकी आवश्यकता नहीं। तोतेकी तरह सीखा हुआ ज्ञान पूरा काम नहीं देता।असम्मूढ़ता क्या है संसार (शरीर) किसीके भी साथ कभी रह नहीं सकता तथा कोई भी संसारके साथ कभी रह नहीं सकता और परमात्मा किसीसे भी कभी अलग हो नहीं सकते और कोई भी परमात्मासे कभी अलग हो नहीं सकता -- यह वास्तविकता है। इस वास्तविकताको न जानना ही सम्मूढ़ता है और इसको यथार्थ जानना ही असम्मूढ़ता है। यह असम्मूढ़ता जिसमें रहती है? वह मनुष्य असम्मूढ़ कहा जाता है। ऐसा असम्मूढ़ पुरुष मेरे सगुणनिर्गुण? साकारनिराकार रूपको तत्त्वसे जान लेता है? तो उसे मेरी लीला? रहस्य? प्रभाव? ऐश्वर्य आदिमें किञ्चिन्मात्र भी सन्देह नहीं रहता। सम्बन्ध --  पहले श्लोकमें भगवान्ने जिस परम वचनको सुननेकी आज्ञा दी थी? उसको अब आगेके तीन श्लोकोंमें बताते हैं।