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Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 8

भगवद् गीता अध्याय 1 श्लोक 8

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च।।1.8।।

हिंदी अनुवाद - स्वामी रामसुख दास जी ( भगवद् गीता 1.8)

।।1.8।।आप (द्रोणाचार्य) और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा? विकर्ण और सोमदत्तका पुत्र भूरिश्रवा।

हिंदी अनुवाद - स्वामी तेजोमयानंद

।।1.8।।एक तो स्वयं आप भीष्म कर्ण और युद्ध विजयी कृपाचार्य तथा अश्वत्थामा विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र है।

हिंदी टीका - स्वामी रामसुख दास जी

।।1.8।। व्याख्या  भवान् भीष्मश्च  आप और पितामह भीष्म दोनों ही बहुत विशेष पुरुष हैं। आप दोनोंके समकक्ष संसारमें तीसरा कोई भी नहीं है। अगर आप दोनोंमेंसे कोई एक भी अपनी पूरी शक्ति लगाकर युद्ध करे तो देवता यक्ष राक्षस मनुष्य आदिमें ऐसा कोई भी नहीं है जो कि आपके सामने टिक सके। आप दोनोंके पराक्रमकी बात जगत्में प्रसिद्ध ही है। पितामह भीष्म तो आबाल ब्रह्मचारी हैं और इच्छामृत्यु हैं अर्थात् उनकी इच्छाके बिना उन्हें कोई मार ही नहीं सकता। महाभारतयुद्धमें द्रोणाचार्य धृष्टद्युम्नके द्वारा मारे गये और पितामह भीष्मने अपनी इच्छासे ही सूर्यके उत्तरायण होनेपर अपने प्राणोंका त्याग कर दिया।  कर्णश्च   कर्ण तो बहुत ही शूरवीर है। मुझे तो ऐसा विश्वास है कि वह अकेला ही पाण्डवसेनापर विजय प्राप्त कर सकता है। उसके सामने अर्जुन भी कुछ नहीं कर सकता। ऐसा वह कर्ण भी हमारे पक्षमें है। कर्ण महाभारतयुद्धमें अर्जुनके द्वारा मारे गये।  कृपश्च समितिञ्जयः   कृपाचार्यकी तो बात ही क्या है वे तो चिरंजीवी हैं  (टिप्पणी प0 8)  हमारे परम हितैषी हैं और सम्पूर्ण पाण्डवसेनापर विजय प्राप्त कर सकते हैं। यद्यपि यहाँ द्रोणाचार्य और भीष्मके बाद ही दुर्योधनको कृपाचार्यका नाम लेना चाहिये था परन्तु दुर्योधनको कर्णपर जितना विश्वास था उतना कृपाचार्यपर नहीं था। इसलिये कर्णका नाम तो भीतरसे बीचमें ही निकल पड़ा। द्रोणाचार्य और भीष्म कहीं कृपाचार्यका अपमान न समझ लें इसलिये दुर्योधन कृपाचार्यको संग्रामविजयी विशेषण देकर उनको प्रसन्न करना चाहता है।  अश्वत्थामा   ये भी चिरंजीवी हैं और आपके ही पुत्र हैं। ये बड़े ही शूरवीर हैं। इन्होंने आपसे ही अस्त्रशस्त्रकी विद्या सीखी है। अस्त्रशस्त्रकी कलामें ये बड़े चतुर हैं।  विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च   आप यह न समझें कि केवल पाण्डव ही धर्मात्मा हैं हमारे पक्षमें भी मेरा भाई विकर्ण बड़ा धर्मात्मा और शूरवीर है। ऐसे ही हमारे प्रपितामह शान्तनुके भाई बाह्लीकके पौत्र तथा सोमदत्तके पुत्र भूरिश्रवा भी बड़े धर्मात्मा हैं। इन्होंने बड़ीबड़ी दक्षिणावाले अनेक यज्ञ किये हैं। ये बड़े शूरवीर और महारथी हैं। युद्धमें विकर्ण भीमके द्वारा और भूरिश्रवा सात्यकिके द्वारा मारे गये। यहाँ इन शूरवीरोंके नाम लेनेमें दुर्योधनका यह भाव मालूम देता है कि हे आचार्य हमारी सेनामें आप भीष्म कर्ण कृपाचार्य आदि जैसे महान् पराक्रमी शूरवीर हैं ऐसे पाण्डवोंकी सेनामें देखनेमें नहीं आते। हमारी सेनामें कृपाचार्य और अश्वत्थामा ये दो चिरंजीवी हैं जबकि पाण्डवोंकी सेनामें ऐसा एक भी नहीं है। हमारी सेनामें धर्मात्माओंकी भी कमी नहीं है। इसलिये हमारे लिये डरनेकी कोई बात नहीं है।

हिंदी टीका - स्वामी चिन्मयानंद जी

।।1.8।। यद्यपि कुछ क्षणों के लिये अपराध की भावना एवं मानसिक उतेंजना के कारण दुर्योधन का विवेक लुप्त हो गया था किन्तु एक तानाशाह की भाँति उसने शीघ्र ही अपने आप को संयमित कर लिया। सम्भवत द्रोणाचार्य के उत्साहरहित मौन से वह समझ गया कि उन्हें द्विज कहकर सम्बोधित करके वह शील की मर्यादा का उल्लंघन कर रहा था।

English Translation - Swami Gambirananda

1.8 (They are:) Your venerable self, Bhisma and Karna, and Krpa who is ever victorious in battle; Asvatthama, Vikarna, Saumadatti and Jayadratha.

English Translation - Swami Sivananda

1.8. Thyself and Bhishma, and Karna and also Kripa, the victorious in war, Asvatthama, Vikarna, and also Bhurisrava, the son of Somadatta.

English Translation - Dr. S. Sankaranarayan

1.8. Your goodself, and Bhisma, and Karna, krpa, Salya, Jayadratha, Asvatthaman, and Vikarna, and Somadattas son, the valourous;

English Commentary - Swami Sivananda

1.8 भवान् yourself? भीष्मः Bhishma? च and? कर्णः Karna? च and? कृपः Kripa? च and? समितिञ्जयः victorious in war? अश्वत्थामा Asvatthama? the son of Dronacharya? विकर्णः Vikarna? च and? सौमदत्तिः the son of Somadatta? तथा thus? एव even? च and.No Commentary.

English Translation of Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya's

1.8 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.

English Translation of Commentary - Dr. S. Sankaranarayan

1.2 1.9 Why this exhaustive counting? The reality of things is this:

English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary

1.1 - 1.19 Dhrtarastra said - Sanjaya said Duryodhana, after viewing the forces of Pandavas protected by Bhima, and his own forces protected by Bhisma conveyed his views thus to Drona, his teacher, about the adeacy of Bhimas forces for conering the Kaurava forces and the inadeacy of his own forces for victory against the Pandava forces. He was grief-stricken within. Observing his (Duryodhanas) despondecny, Bhisma, in order to cheer him, roared like a lion, and then blowing his conch, made his side sound their conchs and kettle-drums, which made an uproar as a sign of victory. Then, having heard that great tumult, Arjuna and Sri Krsna the Lord of all lords, who was acting as the charioteer of Arjuna, sitting in their great chariot which was powerful enough to coner the three worlds; blew their divine conchs Srimad Pancajanya and Devadatta. Then, both Yudhisthira and Bhima blew their respective conchs separately. That tumult rent asunder the hearts of your sons, led by Duryodhana. The sons of Dhrtarastra then thought, Our cause is almost lost now itself. So said Sanjaya to Dhrtarastra who was longing for their victory. Sanjaya said to Dhrtarastra: Then, seeing the Kauravas, who were ready for battle, Arjuna, who had Hanuman, noted for his exploit of burning Lanka, as the emblem on his flag on his chariot, directed his charioteer Sri Krsna, the Supreme Lord-who is overcome by parental love for those who take shelter in Him who is the treasure-house of knowledge, power, lordship, energy, potency and splendour, whose sportive delight brings about the origin, sustentation and dissolution of the entire cosmos at His will, who is the Lord of the senses, who controls in all ways the senses inner and outer of all, superior and inferior - by saying, Station my chariot in an appropriate place in order that I may see exactly my enemies who are eager for battle.

Commentary - Chakravarthi Ji

Saumadatti refers to Bhurisrava, the son of Somadatta.

Rudra Vaishnava Sampradaya - Commentary

The most powerful commanders are being named now. Samjitinjayah means always victorious in battle. This applies to Drona and Bhishmadeva and all the warriors named herein. The son of Somadatta was known as Bhurishravas.

Brahma Vaishnava Sampradaya - Commentary

Madhvacarya has no commentary so we present Baladeva Vidyabhusanas. The names Duryodhana has mentioned are: Bhavah referring to Drona himself. Vikarna who is the younger brother of Duryodhana and Bhurisrava is the son of Somadatta. Samitinjayah means ever victorious and is applied to Bhishma, Karna, Kripa and Asvatthama, the seven maha-rathas mentioned.

Shri Vaishnava Sampradaya - Commentary

There is no commentary for this verse.

Kumara Vaishnava Sampradaya - Commentary

Here Duryodhana by the word bhavan is qualifying Drona as well as three others while mentioning those who are powerful in his army. The adjective samitinjaya meaning always victorious in battle applies to these four being Drona, Bhisma, Karna and Krpa. Then he points out others who are almost as powerful as these four such as Asvatthana and others. Asvatthama is the son of Drona. Vikarna is the younger brother of Duryodhana, Bhurisrava is Saumadatti the son of Somadatta who was the son of Bahilika the cousin of Bhishma.

Transliteration Bhagavad Gita 1.8

Bhavaan bheeshmashcha karnashcha kripashcha samitinjayah; Ashwatthaamaa vikarnashcha saumadattis tathaiva cha.

Word Meanings Bhagavad Gita 1.8

bhavān—yourself; bhīṣhmaḥ—Bheeshma; cha—and; karṇaḥ—Karna; cha—and; kṛipaḥ—Kripa; cha—and; samitim-jayaḥ—victorious in battle; aśhvatthāmā—Ashvatthama; vikarṇaḥ—Vikarna; cha—and; saumadattiḥ—Bhurishrava; tathā—thus; eva—even; cha—also